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प्रेम का वादा, पीड़ा का सच

नारी का हृदय प्रेम में जितना कोमल होता है, पीड़ा में उतना ही कठोर अनुभवों से गुजरता है। प्रेम से पीड़ा तक का यह सफ़र उसकी संवेदनाओं को भीतर तक झकझोर देता है। धोखा, अपमान और परित्याग उसके आत्म-सम्मान को धज्जी-धज्जी कर देते हैं, कभी-कभी तो उसे जीवन-लीला समाप्त करने की कगार पर पहुँचा देते हैं।

फिर भी वही नारी आँसुओं में भी शक्ति ढूँढ़ लेती है। टूटकर भी वह बिखरती नहीं, बल्कि खुद को गढ़ लेती है—अपनी प्रतिमा, जिसमें प्राण फूँकने के लिए किसी और की आवश्यकता नहीं। यही उसका आत्मविश्वास है, यही उसकी सच्ची शक्ति।

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कर्म हम ऐसा करें…

हर दिन हमारे जीवन में एक नई उमंग और तरंग लेकर आता है। यदि हम अपने कर्म ऐसे करें कि दुनिया हमें देखकर दंग रह जाए, तो यही सच्ची सफलता है। राह में चाहे कांटे हों या शूल, परिस्थितियाँ प्रतिकूल क्यों न हों, सच्चा कर्मवीर अंजाम से नहीं डरता और भूल को कभी दोहराता नहीं। उसका हर काम करने का एक अनोखा और निराला ढंग होता है।

उन्नति की राह पर बढ़ते रहना ही जीवन का ध्येय होना चाहिए। सामने हिमशिखर खड़े हों तो भी उनसे टकराने का साहस रखना चाहिए। आकाश को छूने का जज़्बा होना चाहिए, जैसे उड़ती हुई पतंग। कर्मपथ पर चलते हुए प्रण कभी डगमगाना नहीं चाहिए और न ही ईमान बिकना चाहिए। नए मुकाम हासिल करना और सिर को कभी न झुकाना ही सच्ची जीत है। कर्म ही हमारी काशी-मथुरा हैं, कर्म ही हमारा हाजी मलंग है। यही कर्म हमारी पूजा है, यही कर्म हमारी पहचान है।

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आधुनिक रिश्तों में दूरी और भावनात्मक अकेलेपन को दर्शाता उदास प्रेम दृश्य

…जब मोहब्बत नुमाइश बन गई

अब मोहब्बत भी लिबासों की तरह हो गई है – रोज़ बदलती, ज़माने की रवायत बन चुकी। कभी जो खतों में दिल की धड़कनें उतरती थीं, अब वो सिलसिला कहीं खो गया है। प्यार की जगह नुमाइश रह गई है।

इश्क़ का मिज़ाज देखकर लगता है कि लोगों के पास अब बस फुरसत ही फुरसत है, लेकिन मोहब्बत की असल सदाएं कहीं गुम हो गई हैं। चाहत अब इबादत बनकर रह गई है, और वफ़ा के नाम पर धोखे मिलना किस्मत। आज दुआएं भी सिक्कों में लुटती हैं, अमीरी भी ज़लालत सी लगने लगी है। इरादों को गलत अंजाम देना दीवानों की हिमाकत कहलाता है और बिना वजह इल्ज़ाम लगाना, सियासत।

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साधारण सूती साड़ी पहने महिला और ब्रांडेड कपड़ों में खड़ा पुरुष, सादगी और दिखावे के बीच भावनात्मक अंतर दर्शाता दृश्य

सिर्फ तुम चाहिए

यह कविता आधुनिक जीवन के दिखावे और सादगी के बीच के द्वंद्व को बेहद मार्मिक तरीके से प्रस्तुत करती है। कवि यह संदेश देता है कि रिश्तों में ब्रांड्स और बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि सच्चाई और सादगी ही सबसे महत्वपूर्ण होती है। प्रेम का असली रूप व्यक्ति के भीतर होता है, न कि उसके पहनावे या स्टेटस में।

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माँ का संवाद बेटे से…

माँ अपने बेटे से कहती है—
“दिल के टुकड़े को खुद से दूर भेजना किसी माँ के लिए आसान नहीं होता। तुम्हारी तरक्की और खुशियों के लिए हमें यह कड़वा घूँट पीना पड़ता है। शायद तुम्हारे लिए भी यह सफ़र सहज न हो—कभी आज़ादी गुदगुदाएगी तो कभी जिम्मेदारियाँ बोझ बन जाएँगी। पर याद रखना, तुम्हारे हर कदम पर हमारी दुआएँ और आशीर्वाद एक अदृश्य कवच बनकर तुम्हारे साथ रहेंगे। जब कभी मन उलझे, अकेलापन सताए, तो समझना कि हम दूर होकर भी तुम्हारे बेहद पास हैं।

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राब्ता : एक ग़ज़ल

राब्ता” एक ऐसे दिल की पुकार है, जो अपने ही रिश्ते में दूरी और उदासी महसूस करता है। शिकायत यह नहीं कि मोहब्बत कम है, बल्कि यह है कि समझने और अपनाने की कमी है। ख़्वाब सजाए गए हैं, मगर उन्हें पूरा करने वाली बाहों की गर्मी नहीं मिलती। रक़ीबों की जुर्रत चुभती है, लेकिन अपने परदे की हिफ़ाज़त करने वाला कहीं और खोया रहता है। आईने में भी अब चेहरा नहीं दिखता, क्योंकि नज़रें सिर्फ़ उसी हुस्न की तलाश में हैं। चाँद भी जब उसके दर पर आता है तो उसकी तवाज़ुन खो जाती है। मोहब्बत की क़वायदें शायद काफ़िरों जैसी नहीं होतीं, तभी तो दिल देने के बाद भी सुकून कहीं और नहीं मिलता।

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भारतीय ज्ञान परंपरा का वास्तविक चरित्र समावेशी है : अम्बिका दत्त शर्मा

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, क्षेत्रीय केंद्र कोलकाता और भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद (ICPR) नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में “भारतीय ज्ञान परंपरा और विज्ञान का दर्शन” विषय पर २८-२९ अगस्त को दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन हुआ।उद्घाटन सत्र में डॉ. अमित राय (संयोजक) ने स्वागत भाषण दिया। विशिष्ट अतिथि बिट्ठलदास मूंधड़ा और मुख्य अतिथि प्रो. नवीन चंद्र लोहानी रहे। प्रो. अम्बिका दत्त शर्मा ने बीज वक्तव्य दिया, जबकि अध्यक्षीय उद्बोधन प्रो. हनुमानप्रसाद शुक्ल ने किया। संचालन डॉ. अमरेन्द्र कुमार शर्मा और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. चित्रा माली ने किया।

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साथ चलो, बस थोड़ी दूर…

साथ चलो, बस थोड़ी दूर। वक्त को हमसफ़र बनाकर जीवन की इस राह पर कदम बढ़ाते चलो। आज नहीं तो कल, कल नहीं तो रोज़—कभी तो साथ चलना होगा। रास्तों के मोड़ पर, थकान के क्षणों में, जब भी मन डगमगाए, तुम्हारा साथ राह को आसान बना देगा। दूरियों के बहाने छोड़ो, भीड़ और शोरगुल में भी एक पल का साथ बहुत है। टूटे हुए ख्वाबों की चुभन और धोखे की चोट भले ही हो, फिर भी जिगर की गहराइयों में छिपा अपनापन पुकारता है—थोड़ी दूर साथ चलो। रीलों के इस दौर में, जहाँ जिस्म की नुमाइश ने अपनापन छीन लिया है, वहाँ सच्चा साथ ही सबसे बड़ी ताकत है। नींद भले ही आँखों से कोसों दूर हो, मगर जागे पलों की तन्हाई में यही ख्वाहिश मन को बार-बार पुकारती है—थोड़ी दूर साथ चलो।

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“सृजनिका” के छठे अंक का गरिमामयी लोकार्पण

मुंबई से प्रकाशित त्रैमासिक हिंदी साहित्यिक पत्रिका सृजनिकाके छठे अंक का लोकार्पण मंगलवार, 26 अगस्त को कुर्ला स्थित यूकेएस इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज़ एंड रिसर्च के सभागार में हुआ.
समारोह के मुख्य अतिथि हिन्दुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन के कार्यकारी निदेशक (नॉन-फ्यूल बिज़नेस) मुरलीकृष्ण वेंकट वाद्रेवु ने हिंदी को व्यवसाय-वृद्धि की महत्वपूर्ण सहयोगी भाषा बताते हुए अपने अनुभव साझा किए.

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इंतजार में अमृता प्रीतम…

यह रचना अमृता प्रीतम, साहिर और इमरोज़ की अमर प्रेमकथा की संवेदनाओं को छूती है। लेखिका के अंतर्मन में यह प्रश्न उठता है कि क्या स्वयं वह अमृता जैसी हो सकती है, जिसे साहिर का अल्हड़ किन्तु अनकहा प्रेम मिला और इमरोज़ का निःस्वार्थ साथ। प्रेम की यह त्रयी—अनकहे भाव, निस्वार्थ समर्पण और अनंत प्रतीक्षा—मानव हृदय के उस गूढ़ कोने को उजागर करती है जहाँ प्रेम अपनी सीमाओं और परिभाषाओं से परे जाकर केवल “होने” में अर्थ पाता है। यही सोच अमृता को कालजयी बनाती है और यही प्रश्न आधुनिक मन को बेचैन करता है—क्या अब भी ऐसा दुर्लभ प्रेम संभव है?

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