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गौशाला से अस्पताल तक: सेवा ही जीवन

2019 की एक शाम. वह दिन जोशी जी के लिए खास था रिटायरमेंट का दिन.
सालों की नौकरी के बाद उन्होंने सोचा था, अब परिवार के साथ रहूँगा, बेटियाँ जब भी आएँगी, सारा समय उन्हीं के लिए होगा.
लेकिन हकीकत सपनों से अलग थी. घर में उनकी मौजूदगी किसी को रास नहीं आ रही थी. बेटियाँ बाहर रहती थीं और घर का माहौल बोझिल बन गया था. धीरे-धीरे उनका वजन घटने लगा, चिंता और अकेलापन भीतर ही भीतर उन्हें खा रहा था.
इसी दौरान एक फोन आया -‘जोशी जी, आप रिटायर हो गए हैं न? हमारी गौशाला संभाल लीजिए’.

पुराने परिचित का यह प्रस्ताव सुनकर वे ठिठक गए. पहले तो मना किया, लेकिन जब दोबारा आग्रह हुआ तो उन्होंने शर्त रख दी.मैं पत्नी को साथ लेकर आऊँगा, तभी.जवाब मिला ठीक है, हमें भी आपकी संगत चाहिए. फिर क्या था, उन्होंने गौशाला की बागडोर थाम ली….दिन ऐसे बीतने लगे कि पता ही नहीं चलता था. उन्होंने जनसहयोग से वातानुकूलित कमरे बनवाए, गायों के लिए पक्का फ्लोर डलवाया और पूरी व्यवस्था सुधार दी….अब उन्हें एक सुकून था. कम से कम अब मैं किसी काम तो आ रहा हूँ. इसी बीच, एक अस्पताल के मालिक से मुलाकात हुई. बातचीत के बाद प्रस्ताव आया.’ जोशी जी, आपको हमारे अस्पताल का मैनेजर बनना चाहिए. आपका अनुभव हमें चाहिए’…..जोशी जी की आँखों में चमक आ गई. मुस्कुराते हुए बोले- तो समझिए, अब मेरी नई पारी शुरू.
आज तीन साल हो चुके हैं. वह अस्पताल के मैनेजर के रूप में सम्मान और आत्मविश्वास के साथ जीवन जी रहे हैं.कभी-कभी घरवालों का व्यवहार याद आता है तो दिल चुभ जाता है, लेकिन तुरंत वे खुद को सँभालते हैं मैं बोझ नहीं, अनुभव हूँ. जब तक साँस है, सेवा और कर्म ही मेरा परिवार रहेंगे.

सुरेश परिहार, लाइव वॉयर न्यूज, पुणे

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