आज मिली मैं…खुद से !
यह रचना आत्मखोज की उस गहन यात्रा को दर्शाती है, जहाँ इंसान दुनिया की भीड़ से निकलकर अपने भीतर के सत्य, शांति और वास्तविक अस्तित्व से मिल पाता है।

यह रचना आत्मखोज की उस गहन यात्रा को दर्शाती है, जहाँ इंसान दुनिया की भीड़ से निकलकर अपने भीतर के सत्य, शांति और वास्तविक अस्तित्व से मिल पाता है।
सूरज ढलने ही वाला था, अँधेरा पूरी तरह उतरा नहीं था और बच्चे अभी खेलकर घर नहीं लौटे थे। तभी किसी ने धीरे से पुकारा — “दुन्नो।” इस पुकार ने उसके भीतर कुछ कोमल और अनजाना जगाया। कान के पीछे हल्की सिहरन दौड़ गई। चूल्हे पर दाल उबल रही थी, लकड़ियाँ सुलगानी थीं और रोटियाँ बनानी थीं। उसके विचारों की दुनिया अब तक रोटियों तक सीमित थी, जिन्हें उसे जीवन भर बेलना था।
दुन्नो ने अभिनय किया जैसे उसने कुछ सुना ही न हो। यही उसे सिखाया गया था — अच्छी लड़कियाँ आवाज़ की दिशा में नहीं देखतीं, कुँवारी लड़कियाँ मोम की बनी होती हैं, जिन्हें आँच से बचाकर रखना ही उनका कर्तव्य है। लेकिन वह पुकार फिर आई, इस बार स्वर में मिठास थी। हाथ में लोई थामे उसने पूछ लिया — “कौन हो तुम? जो पुकारता है मुझे, जबकि मैं खुद अपना नाम भूल चुकी हूँ। तुमने मुझे जीवित पुकारा, तो क्या मैं सच में ज़िंदा हूँ?”
सालों की नौकरी के बाद जब जोशी जी ने रिटायरमेंट ली, तो सोचा था अब परिवार संग सुखमय समय बिताएँगे। लेकिन हकीकत कुछ और थी—अकेलापन और खालीपन ने उन्हें भीतर से तोड़ दिया। तभी जीवन ने नया मोड़ दिया। पहले गौशाला की सेवा, फिर अस्पताल में मैनेजर की जिम्मेदारी… और यहीं से शुरू हुई उनकी दूसरी पारी। आज वे सम्मान और आत्मविश्वास के साथ जी रहे हैं, यह साबित करते हुए कि “रिटायरमेंट अंत नहीं, बल्कि नई सुबह की शुरुआत है।”
अस्तित्व की खोज में वह खुद से बार-बार टकराती है। कभी सपनों में, कभी आकांक्षाओं में, तो कभी शब्दों की परछाइयों में अपने होने का अर्थ तलाशती है। वह अपने भीतर दबे सवालों को सुनती है—”कौन हूँ और क्या हूँ मैं?” और हर बार यह अहसास होता है कि उसका वजूद अभी अधूरा है। यही अधूरापन उसे फिर से जगाता है, नव-कोंपलों-सा उगाता है। अंततः वह अपने भीतर एक ऐसा वृक्ष देखती है, जो अपनी जड़ों से अनगिनत संभावनाएँ पोषित करता है। यही उसका नया अस्तित्व है—सशक्त, गहन और अडिग।
आज का खयाल सीधा दिल को छू गया—क्यों न खुद से ही अपनी कीमत पूछी जाए, बजाय दूसरों की नज़रों में ढूँढ़ने के। क्यों न एक ख़त खुद को लिखा जाए, जिसमें अपने ही बचपन की हँसी, अपनी ही रंगीन तितली-सी चंचलता, और अपनी ही खुशबू को फिर से महसूस किया जाए। जीवन की भाग-दौड़ में खोकर हम खुद को सँवारना भूल जाते हैं, लेकिन जब खुद से मुलाक़ात होती है, तो एहसास होता है कि सबसे बड़ा ख़िताब, सबसे सुंदर परिभाषा, हमेशा से हमारे अपने ही नाम थी।
यह कविता एक ऐसी संवेदनशील आत्मा की आवाज़ है जो दुनियावी दिखावे और भीड़ की नजरों से छुपे अपने दर्द, संघर्ष और अंतर्मन की झंझावतों को बयां करती है। वह खुद को रोज़ झुकाते हुए भी टूटी नहीं है, अपने अंदर के तूफ़ान से रोज़ लड़ती है, लेकिन उसकी चुप्पी, उसका हौसला, उसकी मोहब्बत और उसकी संभावनाएं—किसी की नज़र में नहीं आतीं। यह एक ऐसा आईना है जिसमें हर वो व्यक्ति खुद को देख सकता है जिसने कभी खुद को भीड़ में खोया पाया हो।