अहसास का रिश्ता

बुढ़ापे में अकेलेपन से लड़ते-लड़ते थक चुके थे दोनों। बच्चे अपनी दुनिया में चले गए थे। सुबह की वॉक में बस हल्की सी “नमस्ते” होती थी. लेकिन उसी छोटी-सी मुस्कान ने भीतर कहीं एक गहरी पहचान बना दी थी। फिर धीरे-धीरे चाय, ग़ज़लें, खाना, बीमार पड़ने पर ख़याल… और एक दिन एहसास हुआ. हम तो एक-दूसरे के सहारे फिर से जीना सीख गए हैं।प्यार कभी उम्र नहीं देखता।
कभी देर से ही सही . पर सच्चा साथ मिल जाता है।

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गौशाला से अस्पताल तक: सेवा ही जीवन

सालों की नौकरी के बाद जब जोशी जी ने रिटायरमेंट ली, तो सोचा था अब परिवार संग सुखमय समय बिताएँगे। लेकिन हकीकत कुछ और थी—अकेलापन और खालीपन ने उन्हें भीतर से तोड़ दिया। तभी जीवन ने नया मोड़ दिया। पहले गौशाला की सेवा, फिर अस्पताल में मैनेजर की जिम्मेदारी… और यहीं से शुरू हुई उनकी दूसरी पारी। आज वे सम्मान और आत्मविश्वास के साथ जी रहे हैं, यह साबित करते हुए कि “रिटायरमेंट अंत नहीं, बल्कि नई सुबह की शुरुआत है।”

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