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जिंदगी भर नहीं भूलेगी मेट्रो की वो रात…

एक भागती-दौड़ती मुंबई की रात में, मैं मेट्रो के सफर पर थी, अपने बैग और गिफ्ट बॉक्स के साथ, साड़ी में शाही अंदाज़ लिए। एक अजनबी सज्जन ने बिना किसी शब्द के मेरी मदद की, मेरा सामान लौटाया और बाद में टिकट लेने में भी सहायता की। हमारी अनौपचारिक बातचीत, मुस्कानें और छोटे-छोटे इशारे उस रात को यादगार बना गए। सफर के बीच हमारी बातचीत इतनी सहज और हल्की थी कि समय का पता ही नहीं चला। उनके व्यवहार में न तो अश्लीलता थी, न कोई लालसा सिर्फ मित्रवतता और आदर।

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नीम का पेड़

एक लंबे समय बाद उसी स्टेशन पर उतरते ही यादों की महक मुझे बाँहों में भर लेती है। बचपन की गलियाँ, नीम का पेड़, उड़ती रुई और टूटी-फूटी बस सब मन के भीतर फिर से जीवित हो उठते हैं। मगर जब शहर नए नामों और मॉलों में बदल चुका होता है, तो एहसास होता है कि स्मृतियाँ जहाँ ठहरी थीं, समय वहाँ से बहुत आगे निकल गया है।

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मंज़िल मिल ही जाएगी

निरंतर प्रयास और पूरे विश्वास के साथ बढ़ते रहने से मंज़िल अवश्य मिलती है। चाहे राह में कठिनाइयाँ हों, नाव में छेद हों या अँधेरा छाया होहौसला और संकल्प टूटना नहीं चाहिए। छोटे-छोटे प्रयास, जैसे तिनकों से बना घोंसला, बड़ी बाधाओं का सामना कर लेते हैं। मेहनत ही वह चाबी है जो हर ताला खोलती है; अभ्यास से साधारण बुद्धि भी प्रखर हो जाती है। प्रेम, धैर्य और कर्म के साथ आगे बढ़ने वाला व्यक्ति अंततः अपनी मंज़िल पा ही लेता है।

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मेहनत और सफलता

मेहनत ही सफलता की सच्ची कुंजी है। चाहे चींटी का निरंतर प्रयास हो या कुम्हार, किसान, मजदूर और माता-पिता का श्रम हर जगह यही सच सामने आता है कि लगन और परिश्रम से ही जीवन को आकार मिलता है। जो लक्ष्य पर टिके रहते हैं, वही अंततः सफल होते हैं।

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नियति से बहस नहीं

शैफाली सिन्हा, नवी मुंबई (महाराष्ट्र) बचपन से ही मैंनेख़ुद को पीछे रखकरसबकी सेवा की।लोग आश्वासन देते रहेइसका फल ज़रूर मिलेगा। फल की कभी चाह नहीं रही,बस कोई स्नेह सेदो मीठे बोल कह देतो वही मेरी सबसे बड़ी पूँजी बन जाते। शायद यही मेरी नियति थी,या शायद मेरा होना हीकिसी और का सहारा बनने के लिए…

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क्या मैं बहक गई थी…?

मैं बहक गई थी और यह मानने में मुझे कोई अफ़सोस नहीं। जब मुझे सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, तब मेरा पति मुझसे दूर था। उसी खालीपन में एक पुराना प्यार फिर से सामने आया, जिसने मुझे वह अपनापन दिया जो मैं भूल चुकी थी। उस एक सच ने हमारी शादी को तोड़ा नहीं, बल्कि उसे आईना दिखा गया।

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खुद से खुद की जंग

तुम्हारे जाने के बाद ज़िंदगी अचानक खाली हो गई थी। जो आदतें कभी सुकून देती थीं, वही अब चुभने लगीं। तब समझ आया कि सहारे पर जीना आसान होता है, पर खुद खड़े होना सीखना ज़रूरी। उसी खालीपन में मैंने खुद को पहचाना और धीरे-धीरे अपनी ही ज़िंदगी की लड़ाई लड़ना सीख लिया।

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वरिष्ठ बाल साहित्यकार नीलम राकेश होंगी सम्मानित

बाल साहित्य के क्षेत्र में लंबे समय से सक्रिय और सशक्त रचनात्मक योगदान देने वाली वरिष्ठ बाल साहित्यकार श्रीमती नीलम राकेश को वर्ष 2025 के प्रतिष्ठित ‘अखिल भारतीय अनुराग साहित्य सम्मान’ से सम्मानित किया जाएगा। यह सम्मान अनुराग सेवा संस्थान, लालसोट (राजस्थान) की ओर से प्रदान किया जा रहा है।

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सहनशीलता का अभाव और टूटते रिश्ते

हर इंसान अलग है सोच में, सहने की क्षमता में और जीने के तरीके में। लेकिन जब हम इस भिन्नता को स्वीकार करने के बजाय एक-दूसरे की खामियाँ गिनने लगते हैं, तभी रिश्तों में दूरी बढ़ने लगती है। सहनशीलता और संवाद के बिना परिवार साथ रहते हुए भी बिखरने लगते हैं।

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वह इकलौती पेंट और गर्म इस्त्री

वो मेरी इकलौती पेंट थी। रोज़ धोकर, सुखाकर, इस्त्री करके पहनी जाती। एक ही पेंट में हम स्कूल ऐसे पहुँचते जैसे राजा बाबू हों। एक दिन जल्दी में गर्म इस्त्री से हाथ जल गया, लेकिन दर्द से ज़्यादा डर इस बात का था कि कहीं पेंट न जल जाए। उस जलन का निशान आज भी है संघर्ष की याद बनकर।

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