
सुनील परिहार, नवोदित लेखक, महिदपुर रोड, उज्जैन (मध्यप्रदेश)
हर साल दशहरे के आसपास अख़बार और न्यूज़ चैनल रावण के पुतले की ऊँचाई को लेकर बड़ी-बड़ी ख़बरें छापते हैं। कहीं लिखा होता है 70 फीट, कहीं 100 फीट, लेकिन क्या सच में रावण का कद केवल पुतलों में ही बढ़ रहा है? असल में रावण का कद आज हमारे समाज में भी बढ़ रहा है। फर्क केवल इतना है कि वह लकड़ी और कागज़ का नहीं, बल्कि हमारे विचारों, व्यवहार और आचरण का हिस्सा बन चुका है।
अख़बार पुतलों की ऊँचाई फीट में बताते हैं, लेकिन असली ऊँचाई हमारे भीतर के अहंकार और स्वार्थ की है। जितना बड़ा पुतला, उतनी ही चर्चा और शोभा, मानो बुराई जितनी बड़ी दिखेगी, उतनी ही आकर्षण पैदा करेगी। रामायण का रावण विद्वान था, लेकिन उसके भीतर अहंकार, क्रोध और लालच इतना बढ़ गए कि उसका सारा ज्ञान व्यर्थ हो गया।
आज भी यही स्थिति हमारे समाज में दिखाई देती है। लोग बड़े-बड़े आयोजन करते हैं, भव्यता और दिखावे को महत्व देते हैं, जबकि ईमानदारी और विनम्रता सिकुड़ती जा रही है। झूठ, छल, लालच और अहंकार दिन-ब-दिन “ऊँचे” होते जा रहे हैं। जब हम भ्रष्टाचार को सह लेते हैं, झूठ और दिखावे को सामाजिक स्थान देते हैं, बच्चों को संस्कार के बजाय चमक-दमक सिखाते हैं, तब हम समाज में रावण का कद बढ़ाते हैं।
पुतला जलाना केवल प्रतीक है। असली विजयादशमी तब होगी जब हम अपने भीतर के रावण को पहचानें और उसे जला दें। अपने अहंकार, क्रोध और ईर्ष्या को त्यागें, शांति और धैर्य अपनाएँ, दूसरों की सफलता से प्रेरणा लें और दिखावे की जगह सादगी और सच्चाई को महत्व दें। रावण चाहे कितना भी ऊँचा लगे, अंततः उसका नाश तय है, लेकिन पहले हमें अपने भीतर के रावण को समाप्त करना होगा।
दशहरे का असली संदेश यही है कि बुराई चाहे कितनी भी ऊँची क्यों न लगे, अंततः उसका विनाश निश्चित है, लेकिन विजय तब सच्ची होगी जब हम अपने अंदर के रावण को भी परास्त करें।
बहुत बहुत आभार, इस रचना को livewire पर जगह देने के लिए। इस प्लेटफार्म पर हम जैसे नये लेखक को खुला आसमान मिलता है,अपने विचारो के पंख फैलाने के लिए।🙏🌺बहुत बहुत धन्यवाद