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दिल-ओ-दिमाग़

कभी-कभी एक शब्द चुभ जाता है और दिल-दिमाग़ उलझ जाते हैं। लेकिन जब हम खुद को सामने वाले की जगह रखकर देखते हैं, तो समझ आता है कि क्रोध विवेक छीन लेता है और मन को भटका देता है। मानव बने रहने के लिए मन-मानस का तालमेल जरूरी है।

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रावण का कद बढ़ रहा है ?

यह लेख दशहरे के प्रतीक रावण के पुतले को मात्र लकड़ी और कागज़ का नहीं बल्कि समाज में बढ़ते अहंकार, लालच, क्रोध और दिखावे का प्रतीक बताता है। जैसे-जैसे पुतले का कद हर साल बढ़ता है, वैसा ही हमारे विचारों और आचरण में भी बुराई का आकार बढ़ रहा है। असली विजयादशमी तब होगी जब हम केवल पुतले जलाने तक सीमित न रहकर अपने भीतर के अहंकार, ईर्ष्या और क्रोध को जलाएँ, दूसरों की सफलता से प्रेरणा लें और सादगी, सत्य और नैतिकता को जीवन का आधार बनाएँ। लेख समाज में व्याप्त बुराई और दिखावे के प्रति चेतावनी देते हुए पाठकों को आत्मचिंतन और सकारात्मक परिवर्तन की ओर प्रेरित करता है।

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