
रीतासिंह, प्रसिद्ध लेखिका, बंगलुरू
कब तक रहोगे चुप-चुप यूँ,
तुम आज ज़ुबाँ ज़रा खोलो न।
श्रृंगार-रस से बाहर निकलो,
वीर-रस अब बोलो न।
बह रहा है रक्त चहुँ ओर,
दौर ये कैसा चल पड़ा है।
तोड़ दो दुश्मनों की चालें,
युक्ति कोई ऐसी बोलो न।
सुरक्षित नहीं हैं बेटियाँ आज,
है नज़र भेड़ियों की उन पर।
उड़ी हुई हैं नींद माँओं की,
आँख ज़रा अपनी खोलो न।
आपस में बैर बढ़ाने को,
करते हैं साज़िशें हर रोज़।
न आओ किसी बहकावे में,
नफ़रत की दीवार तुम तोड़ो न।
श्रोता भी सुन के अमल करे,
कवि भी कह के पालन करे।
शब्दों का प्रभाव कुछ ऐसा हो,
हृदय के बंद ज़रा खोलो न।
संभालो ख़ुद को औरों को,
न आने दो बीच में ग़ैरों को।
फहराओ पताका प्रेम का,
देश तुम्हारा—तुम भी देश के हो लो न।
कब तक रहोगे चुप-चुप यूँ,
तुम आज ज़ुबाँ ज़रा खोलो न।
Well thought and well penned