कब तक रहोगे चुप-चुप यूँ…
कब तक हम चुप रहेंगे? समय आ गया है कि हम अपनी ज़ुबान खोलें और केवल श्रृंगार-रस में खोए रहने के बजाय वीरता का स्वर बुलंद करें। चारों ओर रक्त बह रहा है, हालात भयावह हो चुके हैं, और हमें शत्रुओं की चालों को तोड़ने के लिए नई युक्तियाँ ढूँढ़नी होंगी।
आज बेटियाँ सुरक्षित नहीं हैं। भेड़िए जैसी नज़रें हर ओर लगी हुई हैं, और माँओं की नींद उड़ चुकी है। आँखें मूँदकर अब और चुप नहीं रहा जा सकता।
हर दिन आपसी बैर और नफ़रत बढ़ाने की साज़िशें होती रहती हैं। यह समय है कि हम किसी बहकावे में न आएँ और नफ़रत की दीवारें तोड़ दें। श्रोताओं को भी सुनकर अमल करना होगा और कवियों को केवल कहने भर पर नहीं, बल्कि पालन करने पर भी ज़ोर देना होगा। तभी शब्दों की असली शक्ति सामने आएगी और बंद पड़े हृदय खुल पाएँगे।
