
डॉ. ऋषिका वर्मा, गढ़वाल उत्तराखंड
हमारे देश में नवरात्रि, दुर्गा पूजा और विभिन्न पर्वों पर देवी की आराधना की जाती है। देवी को शक्ति, ज्ञान और ममता का प्रतीक माना जाता है। किंतु यदि समाज में वास्तविक नारी असुरक्षित हो, तो केवल देवी की मूर्तियों की पूजा करना अधूरा और विरोधाभासी है।
नारी मात्र पूजा का विषय नहीं, बल्कि सम्मान और अधिकारों की अधिकारी है। जब समाज उसे सुरक्षा, स्वतंत्रता और समानता देता है, तभी देवी पूजन का वास्तविक भाव जीवित होता है। माँ दुर्गा या सरस्वती की प्रतिमा को सजाकर पूजना आसान है, लेकिन हर घर, हर गली और हर कार्यस्थल पर नारी को सुरक्षित वातावरण देना ही सच्ची भक्ति है। यदि नारी को भय, शोषण और असमानता से मुक्ति न मिले, तो देवी पूजन का सार्थक उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।
भारतीय परंपरा में नारी को ‘शक्ति’ कहा गया है। वही शक्ति घर की आधारशिला और समाज की उन्नति का मूल है। जब नारी सुरक्षित होगी, तभी वह शिक्षा, कार्य और सामाजिक योगदान में अपनी ऊर्जा लगा सकेगी। यह सुरक्षा केवल शारीरिक ही नहीं, बल्कि मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक स्तर पर भी आवश्यक है।
इसलिए नवरात्रि और देवी पूजन हमें यह प्रेरणा देते हैं कि नारी को देवी मानने का अर्थ केवल मंदिर में दीप जलाना नहीं, बल्कि उसके जीवन को सुरक्षित, सम्मानजनक और स्वतंत्र बनाना है। यही सच्चे अर्थों में देवी की आराधना और पूजा की सार्थकता है।

सही बात