Live Wire News literary portal with Gulmohar and Rajnigandha flowers

शिव की शिवा 

सम्पूर्ण वातावरण ढोल, ढाक और ताशों की लयबद्ध ध्वनि से गूँज रहा था। घर-घर से दुर्गा स्तोत्र और आरती के साथ शंख और घंटियों की आवाज़ें आ रही थीं। शारदीय नवरात्र और देवी दुर्गा मइया की भक्ति में शहर डूबा था।नौमी की संध्या-आरती के बाद मालकिन ने फलाहार किया और रेशमा को भी खाने दिया। रेशमा, जिसे बचपन से मालकिन ने गोद में रखा और नाम दिया था, उनकी हर बात और हर काम का अनुसरण करती थी।
शरद की ठंडी रात में, मालकिन ने खिड़की से देखा कि एक लड़की बेतहाशा भाग रही है — पीछे दो-तीन गुंडे उसका पीछा कर रहे थे। लड़की की पीठ और बाँह घायल थी। मालकिन तुरंत देवी माँ से प्रार्थना करती हुई उसके पीछे दौड़ीं।

Read More

सिंदूर-खेला

पूजा पंडाल में ढोल की थाप गूँज रही थी। विसर्जन से ठीक पहले का दिन! लाल बॉर्डर की सफेद साड़ी में सजी महिलाएँ माँ दुर्गा को सिंदूर अर्पित कर, एक-दूसरे की माँग और गालों पर रंग भर रही थीं।

भीड़ के बीच खड़ी रितुपर्णा बाहर से मुस्करा रही थी, मगर भीतर खालीपन था। कुछ महीने पहले पति ने शराब के नशे में घर से निकाल दिया था। अकेली रहती तो ठीक था, पर बच्चे की परवरिश? सोचकर दिल डूब जाता।

तभी उसकी नज़र पंडाल के कोने में गई—एक आदमी अपनी पत्नी पर चिल्ला रहा था। अगले ही पल गाल पर जोरदार थप्पड़! भीड़ ने देखा, पर सब चुप। औरत आँचल मसलती, आँखें झुकाए आँसू पोंछ रही थी।

Read More

नारी के सम्मान से ही देवी पूजा सार्थक

नवरात्रि और दुर्गा पूजा केवल देवी की मूर्तियों की आराधना तक सीमित नहीं हैं। यदि समाज में नारी असुरक्षित है, तो देवी पूजन का वास्तविक भाव अधूरा रह जाता है। नारी सिर्फ पूजा का विषय नहीं, बल्कि सम्मान और अधिकारों की अधिकारी है। उसे सुरक्षा, स्वतंत्रता और समानता मिलती है, तभी देवी की शक्ति, ज्ञान और ममता का प्रतीक सजीव होता है। भारतीय परंपरा में नारी को ‘शक्ति’ कहा गया है, और वही शक्ति घर और समाज की आधारशिला है। मंदिर में दीप जलाना आसान है, पर हर घर, गली और कार्यस्थल पर नारी को सुरक्षित और स्वतंत्र बनाना ही सच्ची भक्ति है। नवरात्रि हमें यही प्रेरणा देती है कि नारी को देवी मानने का अर्थ केवल पूजा नहीं, बल्कि उसके जीवन को सम्मानजनक और सुरक्षित बनाना है।

Read More

माँ दुर्गा का आगमन

माँ दुर्गा के आगमन और नवरात्रि के उत्सव का सुंदर चित्रण करती है। कवि ने माँ के नौ रूपों के वास, भक्ति और श्रद्धा के भाव, तथा उनके दुष्टों के नाश करने वाले रूप का वर्णन किया है। भक्त अपनी विपत्तियों और संकटों में माँ के सामने आता है, उनका उद्धार माँ से आशा करता है। माँ का रूप लाल चुनर, मुकुट और त्रिशूल के साथ दिव्य और आकर्षक दिखाई देता है, और उनकी ममता और करुणा हर भूल और त्रुटि को क्षमा करने वाली प्रतीत होती है। भक्तों द्वारा हलवा-पूरी और चना जैसे भोग अर्पित किए जाते हैं, और वे माँ से आशीर्वाद की कामना करते हैं। पूरी कविता में भक्ति, श्रद्धा और उत्सव का वातावरण स्पष्ट है, जो संसार को माँ के प्रति प्रेम और सम्मान से मोहित करता है।

Read More

राखी के धागों में उलझा बाज़ार और बदलते रिश्तों का रंग

स्नेह के धागों से सिक्त भाई-बहन के बीच अटूट प्रेम का उत्सव है रक्षाबंधन। पर जिस तरह हर त्योहार बाज़ारवाद की भेंट चढ़ता जा रहा है, वहीं रक्षाबंधन का यह पावन पर्व भी इससे अछूता नहीं रह गया। शायद यही कारण है कि आज त्योहार मनाने से पहले हर किसी को अपनी जेब टटोलनी पड़ती है। आखिर, बाज़ार की चमक-दमक और महंगे से महंगे तोहफ़े खरीदने की होड़ ने आम आदमी के हृदय में उपजने वाली उत्सव की सहज भावनाओं को कहीं न कहीं दबा दिया है।

Read More