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शिव की शिवा 

सम्पूर्ण वातावरण ढोल, ढाक और ताशों की लयबद्ध ध्वनि से गूँज रहा था। घर-घर से दुर्गा स्तोत्र और आरती के साथ शंख और घंटियों की आवाज़ें आ रही थीं। शारदीय नवरात्र और देवी दुर्गा मइया की भक्ति में शहर डूबा था।नौमी की संध्या-आरती के बाद मालकिन ने फलाहार किया और रेशमा को भी खाने दिया। रेशमा, जिसे बचपन से मालकिन ने गोद में रखा और नाम दिया था, उनकी हर बात और हर काम का अनुसरण करती थी।
शरद की ठंडी रात में, मालकिन ने खिड़की से देखा कि एक लड़की बेतहाशा भाग रही है — पीछे दो-तीन गुंडे उसका पीछा कर रहे थे। लड़की की पीठ और बाँह घायल थी। मालकिन तुरंत देवी माँ से प्रार्थना करती हुई उसके पीछे दौड़ीं।

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शक्ति हो माँ

माँ, तुम ममता की मूर्ति हो, धीरज और करुणा का अथाह सागर। तुम्हारे आगे शब्द भी छोटे पड़ जाते हैं। आकाश तुम्हें नमन करता है और धरती तुम्हारी आरती उतारती है। जीवन के हर सुख-दुख में तुम्हारा हाथ थाम लेने से मन को संबल मिलता है। मेरी प्रत्येक साँस तुम्हारी ही देन है, हर क्षण तुम्हारे ध्यान में ही बीतता है।

जब-जब मन डगमगाता है, आँखों में तुम्हारा रूप बसाकर स्थिरता मिलती है। तुम्हारे चरणों में सिर झुकाना ही मेरे जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य है। अंतिम क्षणों में भी यदि तुम्हारे दर्शन मिल जाएँ तो जीवन सार्थक हो जाएगा।

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नारी के सम्मान से ही देवी पूजा सार्थक

नवरात्रि और दुर्गा पूजा केवल देवी की मूर्तियों की आराधना तक सीमित नहीं हैं। यदि समाज में नारी असुरक्षित है, तो देवी पूजन का वास्तविक भाव अधूरा रह जाता है। नारी सिर्फ पूजा का विषय नहीं, बल्कि सम्मान और अधिकारों की अधिकारी है। उसे सुरक्षा, स्वतंत्रता और समानता मिलती है, तभी देवी की शक्ति, ज्ञान और ममता का प्रतीक सजीव होता है। भारतीय परंपरा में नारी को ‘शक्ति’ कहा गया है, और वही शक्ति घर और समाज की आधारशिला है। मंदिर में दीप जलाना आसान है, पर हर घर, गली और कार्यस्थल पर नारी को सुरक्षित और स्वतंत्र बनाना ही सच्ची भक्ति है। नवरात्रि हमें यही प्रेरणा देती है कि नारी को देवी मानने का अर्थ केवल पूजा नहीं, बल्कि उसके जीवन को सम्मानजनक और सुरक्षित बनाना है।

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माँ शैलपुत्री

सुनीता मलिक सोलंकी, मुजफ्फरनगर (उप्र) प्रथम शैलपुत्री देवी,आज नवरात्र में कृपा बरसाए माँ।भक्तों ने सारे तेरे मंदिर सजाए माँ।। पहला दिन शैलपुत्री स्वरूप,पर्वतराज हिमालय की पुत्री तू।पूर्व जन्म में राजा दक्ष की थी पुत्री,तब माँ का नाम पड़ गया था सती।। तेरी महिमा सारी कह न सके माँ,भक्तों ने सारे तेरे मंदिर सजाए माँ।। सती…

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नारी

नारी केवल एक शब्द नहीं है, बल्कि जीवन का उद्घोष है। नारी कई रूपों में विघटित है, गणना से परे, क्योंकि इसके रूप तो अगणित हैं। आज नारी अबला नहीं, बल्कि सबला बनकर अपने अधिकार और सम्मान के परचम लहरा रही है।

पुरुष प्रधान जगत में नारी अब पुरुष से कम नहीं है। नारी पृथ्वी की शक्ति है; बिना नारी के जगत शक्ति विहीन है। संपूर्ण सृष्टि में नारी के बिना सब कुछ ही अधूरा और स्तरहीन है। नारी केवल कामिनी नहीं, शस्त्र-शास्त्र की पर्याय है। नारी केवल जन्मदाता नहीं, बल्कि कभी-कभी मृत्यु भी बन जाती है।

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