
शोभा सोनी, बड़वानी मध्य-प्रदेश
ऐ वक्त, कुछ पल ठहर जा, तुझसे कुछ बातें करनी हैं।
कुछ तुम्हारी सुननी हैं, कुछ अपनी बतानी हैं।
सदियों से मैं तुमसे पूछना चाह रही हूँ, पर तेरी रफ्तार के चलते मेरे प्रश्न हमेशा प्रश्न ही रह जाते हैं।
तू दौड़ता रहता है और मैं तेरे थमने के इंतज़ार में आस लगाए बैठी हूँ, कि तू कुछ पल थमे तो मैं पूछूँ तुझसे—
कहाँ खो गई वो हसीन दुनिया, जहाँ चारों तरफ खुशहाली थी, हरियाली थी,
पावन और शुद्ध पवन चलती थी।
मनुष्य तो ठीक, पशु-पक्षियों में भी प्रेम और उल्लास था।
सूरज की किरणों में भी वात्सल्य का ताप था,
चाँद की चांदनी में भी प्रीत का अहसास था।
चारों तरफ सुकून था—न छल था, न लालच।
सभी में एकता थी, अनुराग था,
आलौकिक और शालीनता भरा व्यवहार था।
बड़ा ही विचलित होता है मन आज के हालात देखकर—
इंसान ही इंसान का दुश्मन है, न भाव बचा, न हमदर्दी।
बस खुदगर्जी का राज है।
कुछ भी ठीक नहीं है—न मौसम, न ही प्रकृति।
हरियाली खत्म हो रही है, खुशहाली खत्म हो रही है।
हर कोई मिटाना चाहता है दूसरे को,
कई ज़िंदगियाँ तो बिन मौत ही मर रही हैं।
समझा दे जरा सा थमकर मुझे—
क्या ये कुदरत तिलमिलाकर अपने अत्याचारों से अपना इंसाफ माँग रही है,
या इंसाफ न होने के कारण हमला कर युद्ध में जीतने की तैयारी?
कई सवाल उठ रहे हैं,
सारे नहीं, बस किसी एक का ही सही जवाब दे,
मेरे मन की उलझन को सुलझा दे।
ऐ वक्त, कुछ पल ठहर जा…
बस कुछ पल।
अति सुन्दर रचना
वाकई वक्त की रप्तार बहुत तेज़ है ये रुक कहां पा रहा है, लेकिन इंसान इससे भी आगे निकलकर मानवता की , प्रकृति से खिलवाड़,नैतिक व चारित्रिक मर्यादाएं लांघ रहा है । काश ये वक्त रुक जा, थम जा ठहर जाए।🙏