gulmohar

मन के भाव..

न के भीतर जन्म लेने वाले भाव ही रचना का आधार बनते हैं। रचनाकार हो, कलाकार हो या चित्रकार—हर सृजन उसी सूक्ष्म अनुभूति से आकार पाता है, जो मन में आहिस्ता से जन्म लेती है।
प्रकृति और परमात्मा ने इस सृष्टि में संतुलन रचा, पर जब मनुष्य अपने ही खुमार और कामना में डूब जाता है, तो यही संतुलन टूटने लगता है। जल, वायु और धरती का दूषित होना किसी बाहरी शत्रु की नहीं, बल्कि मानव की अपनी भूल की कहानी है।

Read More
प्रकृति के बदलते स्वरूप और खोती इंसानियत के बीच समय से सवाल करती एकाकी महिला

ऐ वक्त कुछ पल ठहर जा…

ऐ वक्त, ज़रा ठहर तो सही। सदियों से मन में पलते प्रश्न तेरी तेज़ रफ़्तार के कारण अनकहे रह जाते हैं। मैं पूछना चाहती हूँ—कहाँ खो गई वह दुनिया, जहाँ हरियाली और खुशहाली थी, जहाँ पशु-पक्षियों तक में प्रेम और उल्लास था। सूरज की किरणों में वात्सल्य झलकता था, चाँदनी में प्रीत का अहसास बिखरा रहता था।

आज सब कुछ बदल गया है। इंसान इंसान का दुश्मन बन बैठा है, भावनाएँ सूख गई हैं, हमदर्दी लुप्त हो गई है और खुदगर्जी ही राज कर रही है। न मौसम ठीक है, न प्रकृति। हरियाली मिट रही है, खुशहाली खो रही है। इंसानियत बिन मौत ही मर रही है।

Read More

प्रकृति की पुकार

जिज्ञासा सिंह, (पर्यावरण प्रेमी, साहित्यकार एवं ब्लॉगर), लखनऊ आसमान को छू रहा, ऊँचा खड़ा विकास।पशु-पक्षी बेघर हुए, खोजें निज आवास।। प्लॉटिंग के बाज़ार में, बिकते चारागाह।घर-घर छुट्टा जानवर, व्यापारी की वाह।। उमड़-घुमड़ रोती रही, बदली नभ में आज।सर, सरिता और कूप के, बैरी करते राज।। मेढ़क प्यासा ढूँढ़ता, अपना खोया कूप।कंकड़-पत्थर हैं वहाँ, बदल गया…

Read More
सूखी और बंजर जमीन के बीच उजड़ा हुआ भारतीय गाँव और खामोश बैठे लोग

तीन शब्द

समाचार पत्र के आठवें पृष्ठ के एक छोटे से समाचार ने उसे हिला दिया “ गाँव बिकाऊ है “| उसने इन तीन शब्दों को कई – कई बार पढ़ा | सोचने लगा , आवश्यकता और सुख के साथ – साथ पशु – पक्षी और मनुष्य तो बिक ही रहे थे अब गाँव भी ..`..
अजीब सा लगा उसे | घबराहट सी हुई |उसने अपने बैग को उठा कर गले में डाला और बाइक निकाल जा पहुंचा उस गाँव जहां बड़े – बड़े समाचार – पत्रों , चैनल्स की गाड़ियां साथ ही सरकारी तंत्र और वसाइयों की भी गाड़ियाँ खड़ी थीं | कैमरे चमक रहे थे | दाम लग रहे थे …
पता है किसके ……धूल उड़ाती , दरारों पटी बंजर जमीन के … अपनी ही गहराई नापते कुओं के … घर मकानों के… कोई नहीं पूछ रहा था पशुओं को ? न ही वहाँ के लोगों को ?

Read More