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ऐसा होता तो कैसा होता…

कभी-कभी मन सोचता है अगर दुनिया हमारी इच्छाओं के हिसाब से चलती, तो कैसी होती?
शायद इतनी मीठी कि चॉकलेट, आइसक्रीम, बर्गर और पिज़्ज़ा खाकर भी जेब हल्की न होती।
शायद इतना आसान कि इतिहास और भूगोल की जगह कार्टून और गानों के इम्तिहान होते, जहाँ गलत जवाब देने पर भी मुस्कुराहट मिलती।
कल्पना की इस रंगीन दुनिया में हम हमेशा बच्चे रहते न चिंता, न बोझ, न कल की फिक्र।

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ऐ वक्त कुछ पल ठहर जा…

ऐ वक्त, ज़रा ठहर तो सही। सदियों से मन में पलते प्रश्न तेरी तेज़ रफ़्तार के कारण अनकहे रह जाते हैं। मैं पूछना चाहती हूँ—कहाँ खो गई वह दुनिया, जहाँ हरियाली और खुशहाली थी, जहाँ पशु-पक्षियों तक में प्रेम और उल्लास था। सूरज की किरणों में वात्सल्य झलकता था, चाँदनी में प्रीत का अहसास बिखरा रहता था।

आज सब कुछ बदल गया है। इंसान इंसान का दुश्मन बन बैठा है, भावनाएँ सूख गई हैं, हमदर्दी लुप्त हो गई है और खुदगर्जी ही राज कर रही है। न मौसम ठीक है, न प्रकृति। हरियाली मिट रही है, खुशहाली खो रही है। इंसानियत बिन मौत ही मर रही है।

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