कभी तुम्हारा कभी हमारा

चंद्रकांत देवराव कदम, प्रसिद्ध साहित्यकार, नांदेड़

सबक़ किसी को मिला इशारा, कभी तुम्हारा कभी हमारा
चढ़ा किसी को नशा करारा, कभी तुम्हारा कभी हमारा।

तबाही तूफ़ान ने मचाई, मगर ज़िगर को सुकून है कि
किसी को तो मिल गया किनारा, कभी तुम्हारा कभी हमारा।

दिए हैं हमको भी ज़िंदगी ने मलूल हालात कैसे-कैसे,
बढ़ाकर क़ीमत हुआ ख़सारा, कभी तुम्हारा कभी हमारा।

अमीर हो या ग़रीब, सबको तमीज़ से पेश आना होगा,
जहाँ चलेगी फ़क़त दरारा, कभी तुम्हारा कभी हमारा।

भरी हुई थाली देख के भीगी आँख को याद आ गया कुछ,
हुआ बिना रोटी के गुज़ारा, कभी तुम्हारा कभी हमारा।

हथेली की रेखा पे नहीं, हम तो बाजुओं में यक़ीं करेंगे,
खुलेगा क़िस्मत का भी पिटारा, कभी तुम्हारा कभी हमारा।

किसी की हमने न भूख छीनी, किसी को हमने न प्यासा छोड़ा,
मिला किसी न किसी को सहारा, कभी तुम्हारा कभी हमारा।

जो सूरत-ए-हाल है हमारा, वो कब तलक ऐसे ही रहेगा,
बदल के रख दूँगा मैं नज़ारा, कभी तुम्हारा कभी हमारा।

सिवा हमारे ग़ज़ल किसी की न हो सकेगी कभी मुकम्मल,
बनेगा अंदाज़ सबसे प्यारा, कभी तुम्हारा कभी हमारा।

सलाम ठोकेंगे सब यक़ीनन, ज़रूर आएगा वक़्त ऐसा,
जगह-जगह पे लगेगा नारा, कभी तुम्हारा कभी हमारा।

न लोग भूलेंगे चाँद को और न भूल पाएँगे चाँदनी को,
बनेगा आकाश में सितारा, कभी तुम्हारा कभी हमारा।

6 thoughts on “कभी तुम्हारा कभी हमारा

  1. मेरी रचना प्रसिद्ध करने के लिए आपका बहोत शुक्रिया…😊💐

    1. बहोत शुक्रिया..💐

          1. आदरणीय साथियों मुझे इस बात की खुशी है कि आप सभी लोग एक-दूसरे की रचनाओं को पढ़ते हैं और अपनी राय व्यक्त करते हैं. इसी तरह से वरिष्ठ साथी, नवोदित रचनाकारों को प्रोत्साहित करते रहें और समय-समय पर मार्गदर्शन करते रहें. आप अपनी रचनाएं नियमित रूप से भेज कर सहयोग करते रहें.
            सुरेश परिहार, लाइव वॉयर न्यूज

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