
मौसमी चंद्रा, प्रसिद्ध लेखिका, पटना
एक स्पर्श था, जो हवा में रह गया,
बोलने से ज़रा पहले!
तुम्हारी बात मेरे कानों तक नहीं,
मेरे भीतर तक आई थी।
पर भाषा की गली कुछ संकरी थी उन दिनों,
आधी खिड़की खुली थी,
पर बादलों ने कोई वादा नहीं किया था—
न थमने का, न बरसने का!
स्मृति वहीं टिकी रही, जहाँ तुमने मुझे देखा था,
बिना कुछ कहे!
समय उस शाम बहुत तेज़ चला,
या शायद ऊबकर दूर खड़ा था।
मैंने महसूस किया तुम कुछ कहना चाहते थे,
और मैं,
कुछ न कह पाने की घबराहट में सब कुछ कह चुकी थी।
अब अगर तुम फिर मिलोगे,
तो मैं कुछ नहीं कहूँगी!
बस चुपचाप तुम्हें लिख दूँगी…
हो सके तो,
तुम बस पढ़ लेना।
मन में जाते शब्द
कई बार मौन रह जाना ही सबसे सुंदर जवाब होता है। सुन्दर रचना
कहने – सुनने .में कभी बातें खत्म नहीं होती विशेषकर अगर दूरी हो ।
” अब अगर तुम फिर मिलोगे,
तो मैं कुछ नहीं कहूँगी!
बस चुपचाप तुम्हें लिख दूँगी…
हो सके तो,
तुम बस पढ़ लेना। ”
बहुत सादगीपूर्ण हृदयस्पर्शी रचना ।
‘कुछ न कह पाने की घबराहट में सब कुछ कह चुकी थी’
यही विडंबना होती है जब तक समझ आती है तब तक देर हो गई रहती है।
बहुत ही सहजता से मानव प्रकृति का यथार्थ कह दिया कविता में
ख़ुद से अगले वादे के साथ पुनः स्वभावनुसार वही फ़िर से हो जाता है।
बढ़िया सृजन