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ज़िंदगी गुनगुनाने लगी

अब ज़िंदगी मानो गुनगुनाने लगी है। हवा की धीमी-धीमी बयार की तरह इसमें मिठास घुलने लगी है। मीठे सपनों की छाँव में रात भी अलसाई-सी करवट लेती है। मन अजीबोगरीब खयाल बुनता रहता है और उजली चांदनी-सी उम्मीद सँजोए रहता है।

बातों और मुलाक़ातों का सिलसिला लगातार चलता है, फिर भी दिल के भीतर कहीं एक हल्की-सी खलिश बनी रहती है। बीते दिनों में चारों ओर दावानल था, घाव भी हरे-भरे थे। ऐसे कठिन समय में उसकी बातें मोगरे की महक जैसी सुकून देती थीं।

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इस बार मैं चुप रहूंगी

उस दिन एक स्पर्श हवा में ठहर-सा गया था, ठीक उसी क्षण जब शब्दों ने जन्म लेना ही चाहा था। तुम्हारी बात सिर्फ मेरे कानों तक नहीं पहुँची, वह सीधे भीतर तक उतर आई थी। मगर भाषा की गलियाँ उन दिनों बहुत संकरी थीं। खिड़की आधी ही खुली थी और बादलों ने कोई वादा नहीं किया था—न थमने का, न बरसने का।

स्मृति आज भी वहीं अटकी है, जहाँ तुमने मुझे बिना कुछ कहे देखा था। उस शाम समय बहुत तेज़ी से गुज़र गया था, या शायद वह ऊबकर किनारे खड़ा रह गया था। मुझे लगा था कि तुम कुछ कहना चाहते हो, और मैं अपनी घबराहट में, कुछ न कहकर भी सब कुछ कह चुकी थी। अब अगर तुम फिर से मिलो, तो मैं इस बार चुप रहूँगी। कुछ नहीं कहूँगी—बस तुम्हें लिख दूँगी। और अगर हो सके, तो तुम बस पढ़ लेना।

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