विरह की चुप्पी…

विरह की चुप्पी केवल एक स्त्री की कहानी नहीं है, बल्कि जीवन की गहराई का रूपक है। ऊँचे टीले पर बैठी नायिका सादगी और मासूमियत की प्रतिमा है—उसकी आँखों में टूटी हुई आकांक्षाएँ और मौन में दबे सपने हैं। उसके पास खड़ा सूखा वृक्ष, जैसे उसके मन के उजड़े आँगन का साक्षी हो। और उसी वृक्ष की डाली पर बैठी अकेली चिड़िया, उसकी पीड़ा को गीत में बदल देती है।

पवन उससे प्रश्न करता है—“किसका नाम लिए खोई हो?” लेकिन उत्तर शब्दों में नहीं, आँसुओं में टपकता है। यह मौन, यह अधूरापन, उसी विरह का संगीत है।फिर भी यह कविता केवल दुख का चित्र नहीं है। चिड़िया की तान हमें बताती है कि हर पतझड़ के पीछे छुपी होती है नयी हरियाली, हर सूखेपन के पार होती है नवजीवन की आहट।

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इस बार मैं चुप रहूंगी

उस दिन एक स्पर्श हवा में ठहर-सा गया था, ठीक उसी क्षण जब शब्दों ने जन्म लेना ही चाहा था। तुम्हारी बात सिर्फ मेरे कानों तक नहीं पहुँची, वह सीधे भीतर तक उतर आई थी। मगर भाषा की गलियाँ उन दिनों बहुत संकरी थीं। खिड़की आधी ही खुली थी और बादलों ने कोई वादा नहीं किया था—न थमने का, न बरसने का।

स्मृति आज भी वहीं अटकी है, जहाँ तुमने मुझे बिना कुछ कहे देखा था। उस शाम समय बहुत तेज़ी से गुज़र गया था, या शायद वह ऊबकर किनारे खड़ा रह गया था। मुझे लगा था कि तुम कुछ कहना चाहते हो, और मैं अपनी घबराहट में, कुछ न कहकर भी सब कुछ कह चुकी थी। अब अगर तुम फिर से मिलो, तो मैं इस बार चुप रहूँगी। कुछ नहीं कहूँगी—बस तुम्हें लिख दूँगी। और अगर हो सके, तो तुम बस पढ़ लेना।

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