एक छोटा-सा संदूक पीतल का, पर चमकता सोने-सा। नानाजी-नानीजी ने माँ को दिया था उनकी शादी के समय, आशीष, परंपरा और अपनापन समेटकर।
उसमें भरे थे गहनों के खज़ाने—सोने की चूड़ियाँ, हार, कंगन, नथ, मांगटीका, बाजुबंद, चीक, छाड़ा हसली, पाजेब, झांझर,
चाँदी की मछली, पान और सुपारी,
गिलास, कटोरे और अनगिनत सिक्के।
हर वस्तु में छिपा था एक रिवाज़, एक संस्कार,
एक घर का गर्व।
माँ अक्सर कहतीं, “ये संदूक मेरी नई ज़िंदगी का श्रृंगार था।” उनकी आँखों में झिलमिलाती यादें हमेशा मुझे बाँध लेती थीं। जैसे ही संदूक निकलता, माँ कुछ किस्से जरूर सुनातीं—जैसे कि ऐसा ही और उससे भी बड़ा पीतल का पात्र था, इसमें रखा रहता था पान, जिसे बैठक में आने वालों को खिलाकर स्वागत किया जाता। फिर घी-मिश्री इत्यादि। और उसी बैठक में कितनों की बेटियों का रिश्ता तय होता और हँसी-पकवान से बैठक गुंजायमान हो जाती।
जब भी वो पीतल का संदूक निकलती, तो पता नहीं क्यों… हमें यह अपनी ओर खींचता।
यह संदूक मुझे बचपन से भाता रहा।
जैसे इसके भीतर गूँजते हों
नानी के आशीर्वाद, माँ की हँसी,
और समय की धीमी सरगोशियाँ।
कल आखिर मैंने माँ से कहा—“माँ, इसे मुझे दे दीजिए। आपने इसमें सोने के गहने सँभाले थे, अब मैं इसमें अपनी छोटी-छोटी ऑक्सिडाइज्ड ज्वेलरी रखूँगी।”
और माँ ने मुस्कुराकर वह संदूक मेरे हाथों में थमा दिया।
उस क्षण मुझे लगा—
यह सिर्फ धातु का डब्बा नहीं,
बल्कि पीढ़ियों की परंपरा,
धरोहर और स्नेह का दीप है।
कुछ वस्तुएँ वस्तु नहीं रहतीं,
वे भावनाओं की थाती बन जाती हैं।
मेरे लिए वही है, माँ का यह पीतल का संदूक।

सवितासिंह मीरा, प्रसिद्ध लेखिका, जमशेदपुर
