थर्मामीटर…

शिमला में है एक घर।
घर के भीतर मछलीघर।
मछलीघर में तैर रही
चार मछलियाँ।
उनके साथ वाली एक
मरी है आज सुबह ही।

दाँत निपोरते हुए बता रहा
मछलीघर का मालिक।
“कैसे मरी?” का जवाब मिला—
ठंड से मरी।
कल पानी का तापमान
उचित बनाए रखना भूल गया।

मछलियाँ उदास, शिकायती,
गोल-गोल आँखों से अपनी
देखती-सी लगती काँच के बाहर।

सड़क पर दिख गए एक दिन
कुछ याक, उछल-कूद मचाते,
चुहलबाज़ी करते, दौड़ते-भागते।
खुश हैं वे कि सर्दी बढ़ गई,
तापमान अब उनके
लंबे घने बालों के अनुकूल है।
गर्मी भर परेशान-से एक जगह सजे
मालिक की कमाई करवाते
खड़े रहे हैं बेचारे…

आदमी सभी तरह के तापमान के अनुकूल
बिठा लेता है तालमेल।
वह हर मौसम
परेशान ही रहता है नोटों के लिए।
सर्दी में जेब में पड़े नोट
देते हैं गर्मी,
तो गर्मी में यही नोट
दिल को पहुँचाते ठंडक।
उसके लिए उचित तापमान
का नियंत्रक हैं नोट।

मछलीघर में इधर से उधर
चक्कर काटती
मछलियों-सा ही तो है आदमी—
सीमाओं में कैद,
निश्चित तापमान का मोहताज।

मुँह में भरती कंकड़
फिर उगलती मछलियों की हरकत
बाहर से देखने में लगती
बिल्कुल निरर्थक।
उनकी समझ में होगा भले ही
इस सबका गहरा अर्थ।

उधर याक, जिनके सींगों पर
पहनाए गए हैं पीले कवर,
लगाई गई है लगाम,
रखी है पीठ पर काठी,
समझने की कोशिश में होंगे
आदमी की ऐसी अजीबोगरीब
निरर्थक हरकतों का मतलब।

समझता खुद को नियंता आदमी—
मछलीघर का,
मछलीघर के तापमान का,
याक और उसकी देखरेख का।
जबकि अपनी खुद की लगाम
थमा रखी है उसने
अनदेखी, अनजानी आसमानी शक्तियों को
या फिर जेब में पड़े बेजान नोटों को।

दीप्ति श्रीवास्तव प्रतिमा, प्रसिद्ध लेखिका, शिमला

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