थर्मामीटर…

मनुष्य स्वयं को नियंता मानता है—मछलीघर का, उसके तापमान का, याक और उनकी देखरेख का। पर वास्तव में वह अपनी ही सीमाओं में कैद है, मछलियों की तरह निश्चित तापमान पर निर्भर। कभी जेब में पड़े नोट उसे ठंडक का अहसास कराते हैं, तो कभी वही गर्माहट देते हैं। बाहर से देखने पर मछलियों का कंकड़ भरना और उगलना निरर्थक लगता है, ठीक वैसे ही जैसे याक के सींगों पर चढ़ाए कवर और लगामें। असल में, आदमी की हरकतें भी उन्हीं की तरह अजीब और निरर्थक लग सकती हैं, क्योंकि अपनी लगाम उसने सौंप रखी है अनदेखी शक्तियों और बेजान नोटों को

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हरीतिमा

हरीतिमा कविता में कवयित्री ने प्रकृति की सौंदर्यता और उसकी अद्भुत पुनरुत्थान शक्ति को दर्शाया है। अंधड़ में धराशायी हुए वृक्षों के अवशेषों पर फिर से नवपल्लव खिलते हैं, जीवन की जिजीविषा से भरा एक बैंजनी फूलों का कतार उग आता है। कविता यह संदेश देती है कि धरती बिना किसी लेन-देन के अपार स्नेह और जीवन देती है। हरीतिमा का यह निस्वार्थ उपहार कवयित्री के अंतर्मन में कवि के उस अमर वाक्य को बार-बार गूंजने पर विवश करता है – “आ: धरती कितना देती है!”

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