थर्मामीटर…
शिमला के एक मछलीघर से शुरू होती यह कविता आदमी की उस विडंबना तक पहुँचती है, जहाँ वह खुद को नियंता समझता है, जबकि उसकी अपनी लगाम कहीं और बंधी होती है।

शिमला के एक मछलीघर से शुरू होती यह कविता आदमी की उस विडंबना तक पहुँचती है, जहाँ वह खुद को नियंता समझता है, जबकि उसकी अपनी लगाम कहीं और बंधी होती है।
हरीतिमा कविता में कवयित्री ने प्रकृति की सौंदर्यता और उसकी अद्भुत पुनरुत्थान शक्ति को दर्शाया है। अंधड़ में धराशायी हुए वृक्षों के अवशेषों पर फिर से नवपल्लव खिलते हैं, जीवन की जिजीविषा से भरा एक बैंजनी फूलों का कतार उग आता है। कविता यह संदेश देती है कि धरती बिना किसी लेन-देन के अपार स्नेह और जीवन देती है। हरीतिमा का यह निस्वार्थ उपहार कवयित्री के अंतर्मन में कवि के उस अमर वाक्य को बार-बार गूंजने पर विवश करता है – “आ: धरती कितना देती है!”