थर्मामीटर…
शिमला के एक मछलीघर से शुरू होती यह कविता आदमी की उस विडंबना तक पहुँचती है, जहाँ वह खुद को नियंता समझता है, जबकि उसकी अपनी लगाम कहीं और बंधी होती है।

शिमला के एक मछलीघर से शुरू होती यह कविता आदमी की उस विडंबना तक पहुँचती है, जहाँ वह खुद को नियंता समझता है, जबकि उसकी अपनी लगाम कहीं और बंधी होती है।