“क्या लगता है वो तेरा?
क्यों नहीं जा मरती उसी के साथ?
क्यों मेरे जीवन में ज़हर घोल रही है?
निकल जा मेरे घर से! मुँह काला कर उसी के साथ, कुलटा!! चरित्रहीन कहीं की!!!”
जानकी ने सँभलकर पास ही पड़ी चारपाई का सहारा लेकर खड़े होने की कोशिश की तो सर चकरा गया।
गले में फाँस-सी पड़ रही थी। दिमाग सुन्न था। एक झंझावात-सा चल रहा था।
सूखी आँखें जल रही थीं, लाँछन की आग से।
सफ़ाई में कहने को कुछ भी न था; होता भी तो सुनता कौन!
जो अग्नि परीक्षा दे भी देती, तो रखता कौन?
कदम दरवाज़े की तरफ बढ़ चले थे।
“इतनी रात गए कहाँ जा रही हो…?”
जानकी ने कोई जवाब न दिया।
पति ने भी फिर न पूछा, न रोका!
घर की चौखट लाँघ कर आहत मन लिए जानकी के कदम तीव्र गति से बढ़े जा रहे थे…..
रात के सन्नाटे को चीरती हुई ट्रेन की चीख में आज शामिल थी — एक और चीख!

माधुरी द्विवेदी, प्रसिद्ध लेखिका, कानपुर
औरत के लिए अपने लिए एक छत का इन्तज़ाम करना बिल्कुल आसान काम नहीं है अगर वह पति द्वारा उसके घर से निष्कासित की जाती है ।
आर्थिक रूप से समर्थ होना और शिक्षित होना उसका सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य होना चाहिए।
लेख मे इस ज्वलंत समस्या पर प्रकाश डाला गया है ।
आपकी सुंदर एवं समीक्षात्मक टिप्पणी के लिये, हृदय से आभार 🙏🏻