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एक सफ़र ऐसा भी….

ट्रेन में मिली उस नीली आँखों वाली उदास महिला ने जाते-जाते एक सवाल छोड़ दिया “क्या ब्याहतों के पर काट दिए जाते हैं?” उसकी मुस्कान कुछ पल की थी, बस उतनी देर जितनी देर कोई सावन अपनी बरसात रोक कर खिड़की से झाँकता है। वह स्टेशन पर उतर गई, और मैं सोचता रह गया . कितनी स्त्रियाँ अपनी आँखों में बरसात को कैद करके जी रही हैं, जैसे उन्हें कभी बरसना ही न हो।

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चरित्रहीन

जानकी ने चारपाई का सहारा लिया, पर पाँव डगमगा गए। गले में फाँस-सी अटकी थी, आँखें सूखी होकर भी जल रही थीं। सफ़ाई देने को शब्द नहीं थे, और सुनने वाला भी कौन था? घर की चौखट लाँघते ही उसके कदम रात के सन्नाटे को चीरती ट्रेन की चीख में खो गए—आज उस चीख में शामिल थी एक और चीख।

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