एक सफ़र ऐसा भी….

सरिता सिंह “ नेपाली “ रामनगर , बेतिया पश्चिम – चंपारण

मेरी यात्रा दिल्ली से उज्जैन की थी. इंदौर जाने वाली ट्रेन जाने क्यों ख़ाली-ख़ाली सी थी. तभी मेरी सामने वाली सीट पर एक सभ्रांत महिला आकर बैठी. मैंने सोचा चलो, कोई तो मिला स़फर में!
मैंने महसूस किया कि वह महिला बड़ी उदास थी. उसकी नीली आँखों में मुझे बादलों के सघन झुंड दिखाई दिए. लगा, ज़रा सा कुरेदूँ तो बरस पड़ेंगी. ख़ैर, मैंने औपचारिकता वश पूछ दिया .चाय लेंगी आप?..नहीं.और एक लंबी ख़ामोशी उस कंपार्टमेंट में फैल गई. दोस्ती के दरवाज़े पर दिए दस्तक की कपाट उसने लगभग बंद कर दी थी.एक चीज़ मैंने नोटिस की वह गंभीर नहीं, दुखी ज़्यादा थी.
हालाँकि उसके ना चाहने के बावजूद मैंने कई बार उससे विनम्रता से बातें कीं, और अपनी शालीनता का परिचय देते हुए खाने-पीने की वस्तुएँ भी पेश करता रहा. एक समय ऐसा आया कि वह मेरी बातों पर खिलखिला उठी!
उसके हँसने से उसकी ख़ूबसूरत दंतपंक्तियाँ पुष्प समान खिल उठीं!
किसी की ब्याहता थी वह, फिर भी क्षणांश को मेरा दिल उस पर आ गया.
काश
और फिर मैंने एक लंबी साँस ली. सोचा मुझे ये क्या हो रहा है!
ट्रेन अपनी पटरी पर जाने कितनी आत्मकथाओं को समेटे दौड़ी चली जा रही थी, जैसे उसे अपने गंतव्य पर पहुँचना बेहद ज़रूरी हो.
ढेरों बातें हुईं उससे, परंतु उसने अपनी उदासी के राज़ राज़ ही रखे जैसे उसने कुछ देर के लिए ख़ुशी का मुखौटा पहन लिया हो.
मैं भीतर ही भीतर बड़ी गंभीरता से सोचने लगा था आख़िर इसके साथ हुआ क्या होगा?इतनी खुशमिज़ाज औरत को उदासी का लिबास किसने पहनाया?क्या इसका पति?
यदि हाँ तो वह पुरुष कितना ज़ालिम होगा!
मैं पुरुष था इसके बावजूद पुरुष की ऐसी हरकत से घिन आने लगी. सोचने पर विवश था जिस कोमलता को पोषित करना चाहिए, उसे पुरुष ठोकर क्यों मार देता है?
उससे बातें करने के बाद एहसास हुआ कि वह उन महिलाओं में से हरगिज़ नहीं थी, जिन्हें अपनी अस्मिता में जीना आता है जो परित्यक्ता की परिधि से निकल जाती हैं और उनकी उदासी निरभ्र आसमाँ सी बादलों से विमुक्त हो जाती है.
मगर इस महिला ने तो अपनी आँखों में सावन को कैद करके रखा था जैसे कभी न बरसने को प्रतिबद्ध हो.
सुबह की पहली किरण हमें छूने लगी थी. कोई स्टेशन आने वाला था. ट्रेन की रफ़्तार अब धीमी होने लगी थी.एक छोटे से स्टेशन पर गाड़ी रुकी.वह महिला उसी स्टेशन पर उतर गई.उदासियों के बादलों ने उसे फिर अपने घेरे में ले लिया था वही चेहरे पर पीलापन, वही उदास आँखें
जाते-जाते वह एक सवाल छोड़ गई थी मेरे लिए
.क्या ब्याहतों के पर काट दिए जाते हैं?.

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