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मुन्ना से कीर्ति राणा

₹125 की सेकंडहैंड साइकिल से पत्रकारिता की राह पर निकला मुन्ना ₹125 की सेकंडहैंड लेडीज साइकिल, जिसने मुन्ना के पत्रकार बनने की यात्रा में अहम भूमिका निभाई.

₹125 की साइकिल से शुरू हुआ पत्रकारिता का सफर

suresh parihar

प्रस्तुति-सुरेश परिहार ( कीर्ति राणा की पुस्तक ः किस्से कलमगिरी के से)

यह कहानी एक ऐसे जांबाज पत्रकार की है, जिसने अपनी पत्रकारिता में कामरेडी अंदाज कभी नही छोड़ा.. वह इंदौर का कल का मुन्ना..आज शहर नहीं देश का एक अच्छे पत्रकारों में शुमार है यह कहानी उसी की जुबानी है. मुन्ना कैसे पत्रकार कीर्ति राणा बना. घटना, देशकाल वातावरण सभी उन्हीं की पुस्तक किस्से कलमगिरी से लिए गए हैं. (कीर्ति राणा की किताब किस्से कलमगिरी के की यह सीरीज 4के पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण साबित होगी. ऐसा मेरा विश्वास है)

कभी-कभी कोई मामूली-सी चीज अचानक पूरी जिंदगी का दरवाजा खोल देती है. गूगल पर विश्व साइकिल दिवस के बारे में जानकारी देखते हुए मेरी नजर तारीख पर गई- 3 जून. बस, फिर क्या था. आंखों के सामने वह पुरानी लेडीज साइकिल घूम गई, जिसे मैंने कभी सवा सौ रुपये में खरीदा था.

साइकिल का पहिया घूमता है तो लगता है जैसे रास्ता आगे बढ़ रहा है. लेकिन उस दिन मुझे लगा, पहिया आगे नहीं, पीछे घूम रहा है. बचपन, इंदौर की गलियां, सालवी बाखल, मराठी स्कूल का मैदान, दोस्त, कॉलेज, नौकरी और फिर वह दिन… जब मेरी वही साइकिल यशवंत रोड के इमली साहब गुरुद्वारे के सामने दंगों की आग में जल रही थी.

उस आग में सिर्फ साइकिल नहीं जली थी.

मेरी जिंदगी का एक दौर भी वहीं खत्म हुआ था.

बचपन में साइकिल मेरे लिए किसी ऐसी चीज की तरह थी, जिसे दूर से देखा जा सकता था, छुआ नहीं जा सकता था.

इंदौर के सालवी बाखल, जिसे हम मंडी भी कहते थे, वहां हमारे मकान के पीछे मराठी स्कूल का मैदान था. ग्वाड़ी के बाकी बच्चे डंडे वाली साइकिलों पर पैडल मारते, कैंची चलाते हुए मैदान का चक्कर लगाते और मैं उन्हें हसरत भरी नजरों से देखता रहता.

मेरा कद छोटा था.

इतना छोटा कि डंडे वाली साइकिल पर बैठना ही एक अभियान लगता. आसपास के हमउम्र बच्चे मुझे टिंगू कहकर बुलाते थे. किसी से यह कहने की हिम्मत नहीं होती थी कि एक चक्कर मुझे भी लगाने दो.

डर लगता था.

पैडल मारते समय पैर तक नहीं पहुंचे तो?

गिर गया तो?

घुटने छिल गए तो?

और सबसे बड़ा डर-घर पहुंचने पर मां की डांट और पिटाई.

इसलिए मैंने साइकिल सीखने की इच्छा मन में ही रखी.

बचपन का डर शायद उम्र के साथ खत्म हो जाता है, लेकिन मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ. साइकिल से दूरी बनी रही.

छठी से आठवीं तक कृष्णपुरा के 30 नंबर स्कूल में पढ़ा. घर से स्कूल पैदल जाता था. कभी दोस्त जगदीश बागोरा अपनी दूध बांटने वाली साइकिल लेकर आ जाता तो उसकी साइकिल पर डबल सवारी बैठकर चला जाता.

उसके बाद महाराजा शिवाजीराव उमावि-3 में दाखिला हुआ. बारहवीं तक चिमनबाग से घर तक पैदल आना-जाना चलता रहा.

साइकिल फिर भी मेरी जिंदगी से बाहर ही रही.

कॉलेज में दाखिला लिया तो रास्ता थोड़ा लंबा हो गया. पीएमबी गुजराती आर्ट एंड कॉमर्स कॉलेज जाना होता था. सरदार मित्र मोहनसिंह चड्ढा, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं, उनके साथ रापनि की सिटी बस से कॉलेज आना-जाना शुरू हुआ. चवन्नी रोज का किराया लगता था.

चवन्नी आज सुनने में बहुत छोटी रकम लगती है, लेकिन तब वह भी कई बार जेब पर भारी पड़ती थी.

एक दिन मन में आया-अपनी साइकिल होनी चाहिए.

घर पर बात की.

नई साइकिल की कीमत आठ सौ से एक हजार रुपये के आसपास थी. घर की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि इतनी रकम साइकिल पर खर्च की जा सके.

सपना फिर वहीं रुक गया.

लेकिन शायद जिंदगी में कुछ चीजें हमारे लिए पहले ही तय होती हैं.

उन दिनों जूनी इंदौर थाने में पदस्थ चतुर्वेदी मामा का हमारे घर आना-जाना था. रिश्ते में वे मामा नहीं थे, लेकिन अपनापन ऐसा था कि हम उन्हें मामा ही कहते थे.

उन्हें जब पता चला कि साइकिल खरीदने की इच्छा है तो उन्होंने कहा,

“नई क्यों खरीदना? पुरानी ले लो.”

उनकी सलाह काम कर गई.

उनके माध्यम से सदर बाजार में किराये पर साइकिल देने वाली एक दुकान से एक पुरानी लेडीज साइकिल मिली.

कीमत लगी-125 रुपये.

सवा सौ रुपये.

मेरे लिए वह उस समय सिर्फ साइकिल नहीं थी. वह अपनी सवारी थी. अपनी आजादी थी.

और शायद पहली बार ऐसा लगा था कि अब मैं भी सड़क पर अपने दम पर निकल सकता हूं.

साइकिल घर पहुंची तो उसका स्वागत किसी नए वाहन से कम नहीं हुआ. उसकी पूजा हुई. चिरौंजी-दाने का प्रसाद बांटा गया.

आज सोचता हूं तो हंसी भी आती है और मन भी भर जाता है.

वह साइकिल पुरानी थी, लेकिन हमारे लिए बिल्कुल नई.

अगले दिन से कॉलेज जाने का रास्ता बदल गया.

अब बस का इंतजार नहीं करना था. पैदल नहीं चलना था. मेरी अपनी साइकिल थी.

वही लेडीज साइकिल.

गुजराती कॉलेज की पढ़ाई मैंने उसी पर पूरी की.

फिर प्रेस में कंपोजिंग की नौकरी मिली. बाद में स्वदेश में प्रूफ रीडर की नौकरी मिली. साइकिल मेरे साथ रही.

धीरे-धीरे रास्ते बढ़ते गए.

एक दिन प्रोफेसर-कवि सरोज कुमार ने बताया कि मुंबई में निकलने वाले हिंदी साप्ताहिक ‘करंट’ में हिंदी के जानकार प्रूफ रीडर की जरूरत है.

मैं जाने के लिए तैयार हो गया.

मुंबई चला गया.

करीब साढ़े चार साल बाद जब वापस इंदौर लौटा तो घर के गलियारे में वही साइकिल पड़ी थी.

जंग लगी हुई.

धूल से ढकी हुई.

जैसे रामायण की उर्मिला, जो लंबे इंतजार के बाद भी अपने लक्ष्मण के लौटने की उम्मीद नहीं छोड़ती.

मैंने उसे देखा तो लगा, यह अभी भी मेरी है.

उसकी हालत ठीक करवाई. पहियों की ताड़ी ठीक हुई. टायर बदले. तेल-पानी कराया.

कुछ ही दिनों में वह फिर सड़क पर थी.

“घर आया मेरा परदेसी” की तरह.

अब उसका रास्ता थोड़ा और बड़ा हो गया था.

पहले माया मेशन स्थित भास्कर ऑफिस और बाद में शॉपिंग कॉम्प्लेक्स के सामने बने दैनिक भास्कर भवन तक जाना शुरू हुआ.

कई बार टेंपो से एलआईजी चौराहे तक आता और वहां से पैदल भास्कर तक चला जाता.

दैनिक भास्कर में सिटी रिपोर्टिंग और प्रेस कॉन्फ्रेंस का सिलसिला शुरू हो चुका था.

और मेरी रिपोर्टिंग की साथी अब भी वही सवा सौ रुपये वाली साइकिल थी.

मुझे तब कहां मालूम था कि यही साइकिल एक दिन मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी खबर की गवाह बनेगी.

अक्टूबर-नवंबर 1984.

देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हो चुकी थी. उसके बाद सिख समुदाय के खिलाफ हिंसा और नफरत भड़क उठी थी. इंदौर भी इससे अछूता नहीं रहा.

शहर की हवा बदल गई थी.

सड़कों पर डर था. गलियों में बेचैनी थी. सिख बहुल इलाकों में हिंसा और आगजनी की खबरें लगातार आ रही थीं.

रिपोर्टर के लिए ऐसी खबरों से दूर रहना संभव नहीं था.

मैं अपनी उसी साइकिल से निकलता.

घटनास्थल पर पहुंचता.

देखता.

लिखता.

और फिर खबर लेकर लौटता.

एक दिन खबर मिली कि यशवंत रोड स्थित इमली साहब गुरुद्वारे में हिंसा भड़क गई है.

उत्पाती लोग अंदर घुस गए थे. वहां फंसे लोगों के साथ मारपीट हो रही थी. कुछ लोगों को ऊपरी मंजिलों से नीचे फेंके जाने की खबर थी.

मैं साइकिल लेकर वहां पहुंच गया.

जो देखा, वह आज भी आंखों के सामने है.

सड़क पर सामान जल रहा था. दुकानों के फर्नीचर आग के हवाले थे. टायर जल रहे थे. पुलिस लाठीचार्ज कर रही थी. लोग भाग रहे थे. चीख-पुकार थी. भगदड़ थी.

मैं रिपोर्टिंग करता रहा.

पत्रकार होने का मतलब उस दिन पहली बार पूरी तरह समझ में आ रहा था.

डर था, लेकिन खबर सामने थी.

कुछ देर बाद स्थिति थोड़ी नियंत्रित हुई.

मैं गुरुद्वारे के ठीक सामने वाली बिल्डिंग के पास पहुंचा, जहां पोस्ट ऑफिस हुआ करता था और अब बाटा का शोरूम है.

मैंने देखा—मेरी साइकिल वहां नहीं थी.

एक पल के लिए समझ ही नहीं आया कि क्या हुआ.

मैंने आसपास देखा.

गली में तलाशा.

कहीं नहीं मिली.

मैं वापस उसी जगह आया.

वहां खड़े एक पुलिसकर्मी ने पूछा,

“क्या हुआ?”

मैंने कहा,

“मेरी साइकिल यहां खड़ी थी.”

वह जोर से हंसा.

फिर उंगली से सामने की ओर इशारा किया.

“वो देखो.”

मैंने उधर देखा.

और जैसे मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई.

मेरी साइकिल आग में जल रही थी.

गुरुद्वारे के सामने सड़क पर सामान का जो ढेर जल रहा था, उसी में मेरी साइकिल भी पड़ी थी.

लपटें तेज थीं.

टायर जलते और फूटते तो आवाज होती.

मुझे लगा जैसे मेरी साइकिल की कपाल क्रिया हो रही हो.

मैं दूर खड़ा उसे देखता रहा.

आग में उसका लोहे का ढांचा धीरे-धीरे लाल पड़ रहा था. आगे और पीछे के पहियों का हिस्सा अलग होता जा रहा था.

मैं साइकिल लेकर वहां गया था.

घर पैदल लौटा.

नानी ने पूछा,

“मुन्ना, तेरी साइकिल कहां है?”

मां ने भी घबराकर पूछा,

“क्या हुआ?”

मैंने कहा,

“दंगे में जला दी.”

दोनों के चेहरे पर डर आ गया.

मां ने पूछा,

“तुझे तो कुछ नहीं हुआ ना?”

मैंने कहा,

“नहीं.”

उन्होंने राहत की सांस ली.

“कोई बात नहीं. जल गई तो जल जाने दे.”

साइकिल जल गई थी.

लेकिन उस दिन मुझे यह पता नहीं था कि उसके जलने के साथ मेरी जिंदगी में एक नया वाहन आने वाला है.

और शायद एक नया रास्ता भी.

साइकिल थी नहीं.

शहर में बस-टेंपो चल नहीं रहे थे.

ऑफिस जाना संभव नहीं था.

दूसरे दिन मैंने दैनिक भास्कर के दफ्तर फोन किया.

संपादक यतींद्र भटनागर थे.

उन्हें पूरा किस्सा बताया.

पहले तो वे नाराज हुए.

फिर बोले,

“कैसे भी करके ऑफिस आइए.”

एमजी रोड थाने में शायद उस समय साहब सिंह यादव हेडसाब थे. उनकी मदद से एलआईजी चौराहे तक वाहन से पहुंचने की व्यवस्था हुई.

मैं किसी तरह भास्कर पहुंचा.

भटनागरजी से मिला और उन्हें पूरा किस्सा बताया.

वे कैबिन से बाहर आए.

उन्होंने गोकुल शर्माजी से कहा,

“कीर्ति के लिए कोई गाड़ी की व्यवस्था कराइए.”

पता करवाया गया कि गोडाउन में कोई गाड़ी पड़ी है क्या.

थोड़ी देर बाद खबर आई-

एक लूना पड़ी है.

लूना बाहर निकाली गई.

कपड़ा मारकर उसे साफ किया गया. प्रेस की दूसरी गाड़ी से थोड़ा पेट्रोल निकालकर उसमें डाला गया.

मैं लूना को देख रहा था.

मुसीबत यह थी कि मैंने जिंदगी में कभी लूना चलाई ही नहीं थी.

जिस प्यून ने गाड़ी साफ की थी, उसने पेट्रोल डाला, लूना स्टार्ट की और एक चक्कर लगाकर बताया,

“गाड़ी चालू है.”

मैंने उसे गौर से देखा.

जैसे साइकिल चलाना देखकर सीख लिया था, वैसे ही शायद लूना भी देखकर सीख जाऊंगा.

मैंने लूना स्टार्ट की.

चल पड़ा.

लेकिन कुछ ही देर में गलती से अगला ब्रेक जोर से लगा दिया.

लूना डगमगाई.

मैं गिरने ही वाला था कि पीछे से उसी प्यून ने गाड़ी पकड़ ली.

उसने कहा,

“अगला ब्रेक ऐसे नहीं लगाते. धीरे लगाइए.”

मैंने सिर हिलाया.

फिर से लूना संभाली.

उस दिन पहली बार लगा कि जिंदगी भी शायद ऐसी ही है.

एक सवारी छूटती है तो दूसरी मिल जाती है.

बस उसे चलाना सीखना पड़ता है.

मेरी सवा सौ रुपये वाली साइकिल जल चुकी थी.

लेकिन उसी राख से मेरे जीवन की पत्रकारिता का अगला सफर निकल पड़ा था.

अब मैं साइकिल वाला मुन्ना नहीं था.

मैं धीरे-धीरे कीर्ति राणा बनने की राह पर था.

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