कथनी और करनी के सामाजिक पाखंड पर हिंदी व्यंग्य

मौसमी चंद्रा, पटना
“ना! मुझसे नहीं लिखे जाते ये जाति-धर्म पर लंबे-चौड़े आलेख! मैं नहीं हूँ सोशल मीडिया की उस भीड़ का हिस्सा, जो अपने-अपने धर्म को लेकर लंबी बयानबाजी करे! मैं सबसे पहले खुद को भारतीय मानती हूँ और मेरे लिए इंसान का मतलब केवल इंसान है! जात-पात से ऊपर! शरीर और मन से शुद्ध! केवल भारतीय…! आप मेरी कोई भी किताब उठाकर पढ़ लीजिए… मजाल जो मेरी कथनी और मेरी लेखनी अलग मिलेगी! मेरी लिखी कुछ पंक्तियाँ सुनिए…”
जात-पात कौन चिड़ियाँ,
धरम-वरम कौन नाम,
पहनावे पे न जाओ साब,
मेरा देश है मेरी पहचान!
इंटरव्यू लेता पत्रकार वाह-वाह कह तालियाँ बजाने लगा…
“मैडम, आप जैसी सोच सबकी हो जाए तो क्या बात है! देश ही सुधर जाए अपना! नमन है आपके विचारों को! चलता हूँ… अ..मैडम, वो पानी की बोतल ज़रा बढ़ाएँगी…”
“अ..अरे, ये बोतल तो मेरी जूठी है! मैं लाती हूँ आपके लिए…!”
कहती हुई वह तेजी से रसोईघर में घुसी और…
सारे बर्तनों से अलग-थलग रखे, उपेक्षित-से दो गिलासों में से एक उठाकर आरओ के नीचे लगा दिया…
ऊँचे आदर्शवाद की बातें,
इंसाँ देखे रंग-बिरंगे,
कपड़ों की थान पर बैठे,
एक हमाम के अधनंगे!

थैंक यू 🌸