
पूनम सिंह ‘वत्सला’, जमशेदपुर (झारखंड)
तेरी आशिकी में हम रुसवा हो गए,
तेरे दीदार के ऐसे दीवाने हो गए।
मुझे यूँ दूर से हैरानी से देखते रहे,
दिल धड़काकर जाने क्यों ख़ामोश हो गए।
रातों को जुगनुओं-सा उजाला करते थे,
अब अँधेरी रात में जाने कहाँ खो गए।
तुम आजकल कुछ रूठे-रूठे से लगते हो,
तुम्हें सोचते-सोचते हम बेज़ार हो गए।
क्यों सज़ा देकर यूँ दूर जा बैठे हो,
दवा ढूँढ़ते-ढूँढ़ते तुम ही मरहम हो गए।
जिस दिन इस दुनिया से हम रुख़्सत हो जाएँगे,
हमें याद कर तुम भी शायद बावरे हो जाओगे।
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