
रेखा हजारिका
उदास-उदास भाव से
दिन बीत जाता है,
पर एक भी नया शब्द
जन्म नहीं लेता।
क्या लेखन कोई बीमारी है?
क्या आज तुमने नहीं देखा
बसंत की नर्तकी की
लचकती कमर की थिरकन?
या चंचल फागुन की गति को
देखकर ही
मन की आकांक्षा पूरी हो जाती है?
न यह, न वह
केवल इसलिए नहीं कि
किसी रूपहली नदी के जल में
साँझ का सूरज उतर आए,
और देखते-ही-देखते
पूरा आकाश
एक कविता बन जाए।
अब भी पुकारती है वही घाट,
वही सुनसान-सी साँझ।
क्या तुमने नहीं देखा
चाँदनी से नहाई रात में
नदी के सीने पर
तैरती हुई आती
भाटियाली धुन?
फिर बताओ,
क्या लेखक होना
कोई बीमारी है?
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