पिता की पीड़ा

An elderly Indian father caring for his sick wife in a dimly lit room, reflecting loneliness, sacrifice, and the struggles of old age.

प्रीति अरोरा, बदायूं (उत्तर प्रदेश)

बहुत मजबूर है पिता आज,
जो लाचारी के बोझ से दब रहा है।
दो पहियों की गाड़ी खींच रहा है,
अपनी जीविका बचाने की खातिर
खुद को पसीने से सींच रहा है।

नहीं कमाया तो…
बेटा रोटी नहीं दे पाएगा।
सब मुझ पर ही लुटा देगा तो
अपना परिवार कैसे चलाएगा?

माँ बीमार है खटिया पर,
वह दवा नहीं ला पाएगा।
अरे! ये भी कोई बात हुई?
फिर बेटी को पिकनिक पर कैसे ले जाएगा?

साँझ ढल गई,
पिता कर रहा माँ की देखभाल है।
बहुत अँधेरा है कमरे में,
दिखता नहीं…
ऐनक कहीं संभालकर रख दी है।

वह एक शीशे की ऐनक
कमरे में ढूँढ़ नहीं पाता है।
एक रोशनी भी नहीं उसके भाग्य में,
क्योंकि बत्ती का बिल बहुत आता है।

सुनो बेटा! आज मेरी तबीयत
कुछ नासाज़ है।

पर पापा, आज तो
ऑफिस में बहुत काम है।

ज़िंदगी का नहीं ऐतबार,
वसीयत बनानी भी ज़रूरी है।

सुनते ही इतनी बात
“चलो पापा! रुकना मजबूरी है।”

पूछते नहीं पिता का हाल,
बस सब जायदाद के लालची हैं।
साँसें तो दफन कर ही चुके हैं,
बस शरीर जलाना अभी बाकी है।

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