
प्रीति अरोरा, बदायूं (उत्तर प्रदेश)
यह जो सीता-सा चरित्र चाहते हो ना,
राम-सा बनकर दिखाओ तुम।
नायक बनने का बड़ा शौक है ना,
तो खलनायक का चरित्र न निभाओ तुम।
जला दी तुमने एक अबला
चंद रुपयों की खातिर,
सूली चढ़ा दी तुमने जाने कितनी…..
दहेज प्रथा को निभाने की खातिर।
इक्कीसवीं सदी के युवा हैं हम,
बड़े रौब से बताते हो।
सच में अगर युगांतरकारी हो तो,
किसी बेटी की आबरू तो बचाओ तुम।
फेंक तेजाब तुमने जला दिए
किसी के हौसलों के पर,
करके ऐसा कुकृत्य निर्लज्जतापूर्ण
बनते हो निर्भय, निडर।
है जोश तो थोड़ा होश में आओ,
कागजों में नहीं, जीवंत बहू-बेटी बचाओ।
अगर दम है अपनी मां का लाल कहलाने का,
तो मासूम-सी काया का जिम्मा उठाओ तुम।
गरीब की बेटी, जो काम करने को मजबूर है,
घर के संस्कारों की दीक्षा ही उसका गुरूर है।
बदनज़री का उस पर बोझ मत थोपो,
चंचल मन की मूरत है, पर स्वाभिमानी जरूर है।
मानवता है थोड़ी-सी भी,
तो बहन की राखी की लाज रख लो।
अपनी न सही, पर दूसरों की बहन-सा मान रख लो।
अगर बची है शर्म दिल के किसी कोने में,
बन कलयुग के कृष्ण, द्रौपदी की लाज रख लो तुम।
