
किरण अग्रवाल, सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल)
सबकुछ होना आसान लगा,
माँ होना ही कठिन लगा।
बचपन में कहा करती थी मैं
“मुझे माँ जैसी माँ नहीं बनना।”
क्योंकि डरती थी
उनकी सहनशीलता का अटूट स्तंभ देखकर!
घबराती थी
उनके धैर्य और मेहनत का तालमेल देखकर!
चूल्हे की भट्टी में तपती माँ
जल-सी निर्मल लगती,
और मैं सोचती थी, आखिरकार इस अविचल धारा को
क्या कभी विश्राम मिल पाएगा!
सुई-धागों के बीच हमेशा उलझी माँ…
उन्हें सुलझाने का यत्न
न कोई करता, न ही किसी के पास समय था!
जिम्मेदारियों की चक्की में पिसती माँ का रविवार
कभी न आया,
बस हम ही छुट्टियाँ मनाते रह गए!
हमारे नाज़-नखरों का बोझ
कितना हल्का कर लेती थीं,
हँसतीं, फिर लग जातीं
जैसे पृथ्वी हो!
उस समय कभी हमने नहीं कहा-“हैप्पी मदर्स डे”।
आज भी नहीं कहती,
कहना भी क्या,
उन्हें तो समझ जाऊँ, बहुत है उनके लिए।
पर उनकी आँखों के पानी का रहस्य
कभी जान ही नहीं पाई,
और वही पानी
मेरे हृदय को
और ज्यादा माँ बनाता ही चला गया,
बनाता ही चला गया!!
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