
मौसमी चंद्रा, पटना
लौट आती है भीतर
तुम्हारी उँगलियों की
बुझी हुई तपिश,
किसी बंद मौसम से
रिसने लगती है
तुम्हारे नाम की नमी।
रात की पसलियों पर
धीरे-धीरे फैलता है
एक अकेला चाँद।
और मैं
अपने ही भीतर देर तलक
सुनती रहती हूँ
तुम्हारे न होने की आवाज़।
स्मृतियों की
सीलन लगी देहरी पर
आ बैठता है
इंतज़ार।
मन के
उजड़े बरामदे में
फड़फड़ाने लगते हैं
अधबुझे दिनों के परिंदे।
तुम्हें याद करना
एक सूनी बावड़ी में
अपनी धड़कन
उतार देना है,
जहाँ लौटकर
भर आता है
केवल
भीगा हुआ सन्नाटा।
अब जानती हूँ
प्रेम को
अंत तक ढोने के लिए
कविताएँ नहीं..
तुम्हारी स्मृति चाहिए।
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बहुत सुंदर भावपूर्ण प्रेम कविता 👌
जी शुक्रिया 🙏
Thank u suresh ji🌸
बहुत प्यारी कविता मौसमी 🫶