नज़र से जुदा

विरह में डूबी एक स्त्री, दूर जाती परछाईं को निहारती हुई, आँखों में प्रेम और प्रतीक्षा का गहरा भाव।

संपदा ठाकुर

फेर कर नज़रें वो हमसे चल दिए हैं,
इन निगाहों का बताओ क्या करें हम।
था बसाया जिनको हमने निज नयन में,
उनको नज़रों से जुदा कैसे करें हम।।

है सजा दिल में तुम्हारा अक्स मेरे,
और मेरी एक दुनिया है तुम्हीं से।
हर ग़ज़ल में, गीत में, हर छंद में बस,
है तुम्हें गाया सदा हँसकर ख़ुशी से।

जो जुदा तुम हो गए, तुम ही कहो फिर,
गीत में फिर प्राण को कैसे भरें हम।

था बसाया जिनको हमने निज नयन में,
उनको नज़रों से जुदा कैसे करें हम।।

प्रश्न है तुम कौन थे, अपने हुए जो,
क्यों तुम्हें बिसरा नहीं पाता कभी मन।
तुम अगर थे साथ तो दीपावली थी,
बिन तुम्हारे हो गया मन-प्रांत निर्जन।

था बहुत गहरा समंदर प्रेम का यदि,
नाव थे तुम, तुम बिना कैसे तरें हम।

था बसाया जिनको हमने निज नयन में,
दूर नज़रों से उन्हें कैसे करें हम।।

यह बताओ, जा चुके हो दूर कितने,
लौट आओ लौट सकते हो अगर तुम।
गलतियाँ सौ माफ़ कर दूँगी तुम्हारी,
पर नहीं जाना कभी फिर उस डगर तुम।

फिर वही यमुना बुलाती कृष्ण तुमको,
बिन तुम्हारे रह रहे सहमे, डरे हम।

था बसाया जिनको हमने निज नयन में,
दूर नज़रों से तुम्हें कैसे करें हम।।

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