सत्य

पेड़ की छांव में बैठी महिला स्कूल परिसर में लिख रही है, आसपास खेलते बच्चे और तितलियां हैं, जबकि पृष्ठभूमि में युद्धग्रस्त शहर की धुंधली छवि दिखाई दे रही है।

दीप्ति सारस्वत, शिमला

युद्ध नहीं
इस बार होगी युद्ध पर कविता
क्यों कि हमारे यहां है
अमन का मौसम
*
मैं लिख रही हूं युद्ध पर कविता
जब बैठी हूं मैं अप्रैल के अंतिम सप्ताह की चटख धूप में
अपनी स्कूल बिल्डिंग के पीछे
एक पेड़ की छांह तले
**
जैसा कि होना चाहिए अमन के मौसम में
दो तितलियां पीले रंग की
अभी अभी हवा में तैरती
आपस में चुहलबाज़ी करती
गुज़री हैं मेरी आंखों के सामने से
*
भरी दोपहर है और
एक कुप्पू कहीं
बोल रहा है डालों में छुप कर के
कहते हैं
कुप्पू को जब बोलते सुनें आप
साल में पहली बार
उस वक्त आप जो कर रहे होते हैं
वही काम करते रहते हैं
साल भर के लिए
**
मैं तो सोच रही हूं,
सोच रही हूं
पेड़ की ठंडी छांह तले
मेरे चारों ओर है अमन
और लिखना है मुझे युद्ध पे

अब दो चकोर लगातार बोलने लगे हैं
अलग-अलग दिशा से…
कूजे के फूल खिले हैं
खिली है जंगली लिली बहुतायत में
चींटियां अंडे मुंह में दबाए
निकली हैं कतार में…
कितना तरतीब से है सब आसपास
जैसा कि होना चाहिए एक स्कूल में
**
इस वक्त मेरे पास
बच्चों की किलकारी आ रही है
खेल के मैदान से
एक अध्यापक पढ़ा रहा है कक्षा में
और कुछ
गरमागरम चर्चा चल रही है
स्टाफ रूम में…
मुद्दा है कि
ईरान अमेरिका युद्ध की वजह से
गैस की किल्लत हो चुकी है
सारे विश्व में…
सड़कों की मुरम्मत के लिए
कोलतार नहीं आ रहा
चौपट हो चुकी है तमाम विश्व की व्यवस्था
ट्रंप के एक एक बयान के साथ
शेयर बाज़ार
उठता है कभी,
कभी गिर जाता है धड़ाम से
**
सांप की नानी एक सरसराती गुज़र जाती है मेरी टांगों के नीचे से
मैं हिलती नहीं अपनी जगह से
सांप थोड़े न है
नानी है,
नानी नुकसान नहीं पहुंचाती

बच्चों का वॉली बॉल टीन की छत पर तीन टप्पे खा कर
छलांग लगा चुका है पहाड़ी के नीचे
कुछ लड़के भागते आए हैं
उसके पीछे…
अरे, अरे! गिरना नहीं
सहसा निकला मेरे मुंह से,
एक छोटा लगभग दस एक वर्ष का लड़का भी छलागें लगाता भागा है
बड़े बच्चों के पीछे
लड़के लौट आए हैं बॉल लेकर के
सबसे छोटे वाला लड़का जिसकी आंखों में चमक और गाल लाल हैं
खुश खुश आ रहा है सबसे पीछे
शक्ल ओ सूरत इसकी मिल रही है
उस लड़के से जो छपा है आजकल युद्धग्रस्त क्षेत्र के पोस्टर में
उसके चेहरे का रंग पीछे की खंडहर इमारतों का रंग है
आँखें बुझी बुझी
बाल सीमेंट से सने हुए
चेहरा ज्यों गुलाबी फूल
अंधड़ की भेंट चढ़ गया हो
सुना है इस युद्ध में
एक स्कूल पर भी बम गिरा…
स्कूल जिसमें मेरे ही स्कूल की तरह
होगा अमन का मौसम और वह
बच्चों की किलकिलारियों से गुलज़ार रहा होगा…
**
एक बच्ची अभी अभी उछलती कूदती भागी है मेरे सामने से
एक चोटी से उसकी
सफेद रिबन खुल कर
लहरा रहा है हवा में…
ऐसी ही तो कोई बच्चियां होंगी
जिनपे प्रयोग की गईं अमानवीय
क्रूरताएं…
सिहर जाती हूं मैं ध्यान आते ही
आज ही तो
क्लास में चर्चा निकली थी
अप्स्टीन फाइल्स की
कितने मासूम बच्चे हुए शिकार
अकल्पनीय क्रूरताओं के…

दो बच्चे आ कर बैठ गए हैं मुझसे थोड़ी दूरी पर
एक छोटी सी बच्ची साथ के और भी
छोटे बच्चे को कहानी सुना रही है –
एक बार की बात है, एक राक्षस था
वह छोटे- छोटे बच्चों को पकड़ कर खा जाता था…
कहानी सुनाते सुनाते
दोनों की आँखें राक्षस के ख़ौफ़ से बड़ी बड़ी खुल गई हैं…

मेरी कल्पना में
फेसबुक पर ही कभी देखी
एक तस्वीर उभरती है
एक मंगोल सिपाही ने हाथ में
कोई ढाई तीन साल के बच्चे का
कटा सर बालों से पकड़ रखा है
उसके चेहरे पर विश्व की सबसे बेशर्म और क्रूरतम हंसी है…
मेरी रूह कांप जाती है।
ध्यान आता है समंदर किनारे औंधे मुंह पड़ा तीन साल के
एलेन कुर्दी का शव…
और आती है भूख से मरती वह
अफ्रीकन बच्ची जिसे नोचने के लिए गिद्ध पास ही ताक में बैठा है…
दिमाग सुन्न हुआ जा रहा है
और दिल बेचैन

अमन के दौरान
अकल्पनीय खौफनाक किस्सा है युद्ध।
और युद्ध के दौरान… ?
यह किस्सा बन जाता है
खौफनाक यथार्थ…

मैं बैठी पेड़ की छांह तले
सोच रही हूं
न्यूटन को समझ आया
सेब के पेड़ की छांह तले
गुरुत्वाकर्षण का नियम।
बुद्ध ने
प्राप्त किया
बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान…
कुछ तो है ऐसा
जो मिलता है
सिर्फ़ पेड़ों के तले
आख़िर क्या है वह?
मैं पूछती हूं उस पेड़ से
जो देख रहा है
उतनी ही रुचि से मुझे
जितनी से देखा करता है वह
बंदर तितली चिड़िया या
असमान को
जवाब
फुसफुसाता है वह मेरे कान में
शायद ‘सत्य’

ये रचनाएं भी पढ़ें
यादें…
जिंदगी में बदलाव जरूरी है
नागफनी सी बेटियां !
ख़्वाब
वो गलियां

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *