अल्हड़-सी मुस्कुराती भारतीय लड़की, चेहरे पर हल्की मुस्कान लेकिन आंखों में छुपा दर्द, रात का शांत वातावरण और भावनात्मक माहौल

मैं अल्हड़-सी लड़की

वह खुद को अल्हड़ कहती है- हँसती, खिलखिलाती, सबके बीच सहज दिखती हुई। मगर इस सहजता के पीछे एक शांत, गहरा सन्नाटा है, जहाँ उसके अधूरे ख़्वाब और अनकहे दर्द पलते हैं। वह अपने आँसुओं को पलकों में सजा कर रखती है, ताकि दुनिया उसकी मुस्कान ही देखे। रिश्तों की भीड़ में भी वह खुद को खोजती रहती है, हर बार टूटकर फिर संभल जाती है। उसकी कहानी शोर नहीं करती बस धीमे-धीमे महसूस होती है, जैसे रात की तन्हाई में कोई ख़ामोश उजाला।

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किताब में रखा सूखा गुलाब प्रेम की यादों का प्रतीक

एक सूखा गुलाब, हजार एहसास

पुस्तक के पन्नों में दबा एक सूखा गुलाब सिर्फ एक फूल नहीं, बल्कि अनकहे प्यार और मूक संवाद का प्रतीक है। यह कविता उन भावनाओं को शब्द देती है, जिन्हें कभी कहा नहीं जा सका। समय भले ही गुलाब को सुखा देता है, पर उसकी खुशबू और एहसास दिल में हमेशा जीवित रहते हैं। यह रचना हर उस व्यक्ति को छूती है, जिसने कभी खामोशी में भी गहरा प्रेम महसूस किया हो।

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चाँदनी रात में डायरी पर लिखी प्रेम ग़ज़ल, पास में रखा फाउंटेन पेन और हल्की रोशनी

ग़ज़ल

“तिरी पलकों के साये में” एक भावपूर्ण हिंदी ग़ज़ल है जो प्रेम की नज़ाकत, रिश्तों की अहमियत, इल्म की रोशनी और माँ-बाप के अनकहे दर्द को बेहद संवेदनशील अंदाज़ में प्रस्तुत करती है। हर शेर जीवन की सच्चाई से रूबरू कराता है।

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विरह में डूबी युवती, पायल और कंगन पहने, चाँदनी रात में खिड़की के पास बैठी, आँखों से अश्रुधारा बहती हुई, उदासी और प्रतीक्षा का गहरा भाव।

कैसे आऊँ मैं तुमसे मिलने…

यह रचना और दृश्य विरह के उस क्षण को दर्शाते हैं, जहाँ श्रृंगार, आभूषण और सपने सब धुल चुके हैं, और केवल प्रतीक्षा शेष है। पायल की झंकार और कंगनों की आवाज़ मन की उलझनों का प्रतीक बन जाती है। चाँदनी रात, कोरा काग़ज़ और पहरेदार बनी उदासी सब मिलकर प्रेम की उस पीड़ा को रचते हैं, जहाँ मिलने की चाह सबसे बड़ी व्याकुलता बन जाती है।

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हे केशव, तेरी यह कैसी माया?

कभी साधारण जप सा लगता कृष्ण-नाम आज अचानक मन में तरंग बनकर उठा। जैसे ही भाव की एक बूंद हृदय में गिरी, भीतर का सारा सूखापन हर गया। लगा मानो केशव स्वयं दया कर उपस्थित हो गए हों। बरसों की पुकार, प्रतीक्षा और तड़प का उत्तर आज मिला। रोम-रोम भक्ति से भीग उठा यही क्षण जन्म का सार्थक होना है।

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बचपन को बाँहों में भर लो…

बच्चे रंग, खुशबू और उम्मीदों से भरे उस चमन के फूल हैं जिनकी नर्म हथेलियों पर उनकी पूरी तकदीर लिखी होती है। कहीं धूल-भरी मुट्ठियाँ हैं, कहीं हँसी से भरा बालपन और कहीं वही बचपन घरों में कैद होकर बहेलियों की निगाहों से डरता है। उनके मस्तक वात्सल्य से भीगने के लिए बने हैं, न कि भय से काँपने के लिए। पर सच यह है कि कुछ बच्चे शिक्षा के मंदिरों में बैठते हैं, जबकि कुछ बाहर मायूस खड़े रह जाते हैं.

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आँखों की ख़ामोशी

इन आँखों की ख़ामोशी में एक दबी हुई रागिनी है अनकहे शब्दों की, आधी छूटी कहानियों की। चेहरे पर ठहरी शांति और निगाहों में उठते-गिरते समंदर के बीच एक गहरा मंथन छुपा है। ये आँखें जैसे हर सवाल का जवाब अपने भीतर समेटे बैठी हों, मानो कह रही हों कि उन्होंने बहुत कुछ देखा है… पर कहने के लिए अभी बहुत कुछ बाकी है।

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वो घर मेरा

वो मेरा पुराना घर… जहां न बेफिक्री की कोई सीमा थी, न रिश्तों में कोई दीवार। सालों बाद लौटने पर जैसे समय थम गया। हर कोना, हर दीवार, और बंद पड़ी घड़ी मानो कुछ कहने को बेताब थी। वहां अब भी माँ की पुकार गूंजती है, पर उस चूल्हे की आग बुझ चुकी है। सब कुछ वहीं था, लेकिन जीवन का शोर-गुल, हँसी और मिल बैठने की वो आत्मीयता कहीं खो गई थी। आज सबके अपने कमरे हैं, लेकिन दिलों की दूरी बढ़ गई है। कविता एक भावुक पुकार है – लौट चलें उस पुराने आँगन की ओर, जहाँ त्योहार सिर्फ रस्म नहीं, रिश्तों का उत्सव होते थे।”

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