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यादें

यह भावपूर्ण हिंदी कविता बिछड़ने के बाद भी जीवन के हर कोने में जीवित रहने वाली यादों की कहानी कहती है। प्रेम, स्मृतियों और विरह की संवेदनशील अभिव्यक्ति।

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धुंधले सांध्य वातावरण में एक भारतीय महिला अकेली खड़ी है। उसके पास दलदल में खिला एक कमल दिखाई दे रहा है, जो देह और आत्मा के संघर्ष का प्रतीक है। पृष्ठभूमि में चट्टानें, बहता जल और धुंध आत्मबोध, तन्हाई और अस्तित्व की गहन यात्रा को दर्शा रहे हैं।

प्राण प्रतिष्ठा

प्राण प्रतिष्ठा” एक गहन प्रतीकात्मक कविता है, जिसमें देह, आत्मा, यथार्थ और तन्हाई के बीच संघर्ष को सशक्त बिंबों के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है। यह रचना मनुष्य के अस्तित्व, आत्मबोध और भीतर सुलगती मौन पीड़ा की मार्मिक पड़ताल करती है।

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पेड़ तो वही है, पर तुम बदल गए हो

मन्नत का धागा

“पेड़ तो वही है, पर तुम बदल गए हो…” प्रेम, इंतज़ार, तन्हाई और अधूरी चाहत की पीड़ा को व्यक्त करती यह कविता दिल की गहराइयों को छू जाती है। मन्नत के धागे से शुरू होकर प्रेम के दर्द तक की भावनात्मक यात्रा का मार्मिक चित्रण।

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रात के शांत वातावरण में अकेली स्त्री, चाँदनी और स्मृतियों में डूबी भावनात्मक अनुभूति का दृश्य।

स्मृति और… तुम!

स्मृति और… तुम!’ प्रेम और अनुपस्थिति के सूक्ष्म भावों को गहरी संवेदना के साथ अभिव्यक्त करती कविता है। स्मृतियों की नमी, इंतज़ार की सीलन और भीगे सन्नाटे के बीच यह रचना बताती है कि प्रेम को अंत तक ढोने के लिए शब्द नहीं, स्मृति चाहिए।

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अलग-अलग आकाशों के नीचे खड़े दो व्यक्ति, दूरी के बावजूद गहरे आत्मिक जुड़ाव को दर्शाता भावनात्मक दृश्य।

अनाम बंधन

‘अनाम बंधन’ ऐसी कविता है जहाँ प्रेम आग्रह नहीं, बल्कि एक सूक्ष्म अनुभूति बनकर उपस्थित होता है। दूरी, मौन और आत्मिक संबंध के बीच यह रचना अनकहे भावों की गहराई को छूती है।

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अंधकार से उजाले की ओर बढ़ती चिंतनशील महिला का प्रतीकात्मक भावनात्मक दृश्य।

लक्ष्य जीवन का

यह कविता जीवन के दर्द, संघर्ष, कर्म और उम्मीद की भावनात्मक यात्रा को शब्द देती है। संवेदनाओं, हौसलों और आत्मिक प्रकाश से भरी यह रचना जीवन-दर्शन की गहरी अनुभूति कराती है।

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आँगन में खड़ी बेटी को प्रेम और आशीर्वाद देते माता-पिता का भावनात्मक दृश्य।

सच्ची लगन

अर्चना ज्ञानी, उज्जैन कर्मनिष्ठा और निरंतर प्रयास सेउच्च शिखर पर बढ़ती रहो। अपनी लक्ष्मण-रेखास्वयं खींचकर,मान-सम्मान की गरिमामयीघृत-दीपज्योति बनो। पवित्र आँगन की श्याम तुलसी,चौरे की राम तुलसी जैसी मर्यादित,सागर-सी गंभीरता,आकाश-सी विशालता लिए,नभ में अरुंधति-सी चमकती रहो। मेरे आँगन में हल्दी-कुंकू की रंगोली-सीसदा तुम दमकती रहो।मेरे पावन संस्कारों में पली,चेहरे पर मर्यादा-मोहिनी सजाए,सदा तुम चहकती रहो। माँ…

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लकड़ी की मेज पर खुली किताब और लैपटॉप के साथ किताबों और डिजिटल युग के भावनात्मक संबंध को दर्शाता दृश्य।

किताब दिल में, लैपटॉप हाथ में

‘किताब दिल में, लैपटॉप हाथ में’ कविता किताबों की आत्मीयता, काग़ज़ की खुशबू और डिजिटल दौर की तेज़ रफ़्तार के बीच छुपे भावनात्मक संघर्ष को व्यक्त करती है। यह रचना बदलते समय को स्वीकारते हुए भी दिल में बसती किताबों की अमिट जगह को संवेदनशील शब्दों में उकेरती है।

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खिड़की पर तिनके लिए बैठी एक नन्ही गौरैया, जो आशा और जीवन की ऊर्जा का प्रतीक दिखाई दे रही है।

गौरैया

खिड़की पर आकर चहकती गौरैया केवल एक पक्षी नहीं लगती, बल्कि जीवन की जिद और आशा का जीवंत रूप प्रतीत होती है। नन्ही चोंच में तिनके दबाए वह जैसे हर बार याद दिलाती है कि टूटे हुए घोंसले भी फिर से बसाए जा सकते हैं। उसकी चपल उड़ान और निरंतर प्रयास उस मन से संवाद करते हैं, जो उदासी और पीड़ा के बोझ तले थक चुका है। यह कविता गौरैया के माध्यम से जीवन, आशा और भीतर फिर से घर बनाने की इच्छा को संवेदनशीलता से अभिव्यक्त करती है।

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