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साक्षी

एक स्वप्न, जो केवल देखा नहीं जाता — बल्कि देखा जाता है, उसे देखते हुए। यह कविता दृष्टि, अनुभूति और अस्तित्व की उस हल्की परत को छूती है जहाँ देखने और देखे जाने की सीमाएँ धुंधली हो जाती हैं।

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…अगर ज़िंदगी फिर से मुड़ जाए

इस कविता में एक स्त्री अपने जीवन के उस मोड़ पर खड़ी होकर गुज़रे समय को फिर से जीने की ख्वाहिश करती है — वो अधूरे सपने, वो रिश्ते, वो बचपन की अलमारी, और माँ की बातें… सब कुछ एक बार फिर सहेजने की उम्मीद लिए। यह एक आत्ममंथन है, एक नई शुरुआत की ओर बढ़ने का भावुक आह्वान।”

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