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सावन को आने दो

सावन की बारिश में अपने प्रिय का इंतजार करती एक युवती कुछ एहसास शब्दों से नहीं, बारिश की बूंदों से कहे जाते हैं।

विजया डालमिया, हैदराबाद

कितना कुछ कहना चाहते हैं,
पर कह नहीं पाते,
और एहसास कहीं नहीं जाते।

उमड़ते-घुमड़ते बादलों की तरह
बिन बरसे ही लौट जाना
इनकी नियति है।

कितने खुशनसीब होते हैं
वो मेघ
जो बरस जाते हैं।

अपने साथ
अनकहे लफ़्ज़ों के स्वर भी
बादल ले आते हैं।

हर बूंद का स्पर्श
मुखरित होने लगता है,
जिन्हें अंगीकार कर
मन बहकने लगता है।

ये सुर,
ये स्वर,
ये बारिश
और बारिशों की शोखियाँ…

तुम कहाँ हो?
आ भी जाओ।

तराने पुकार रहे तुम्हें,
संग गुनगुनाने को।

मौसम मचल रहा
किसी का साथ पाने को।

क्या कहा…
हवा ने?

कुछ नहीं…
जाने दो।

मुझे याद आया,
उसने कहा था…

“सावन को आने दो…”

2 thoughts on “सावन को आने दो

  1. जी वाह बहुत खूब 👌👌

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