
सुरेश परिहार, पुणे
दिल्ली से इंदौर जाने वाली ट्रेन धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म से निकल रही थी.
राघव खिड़की के पास बैठा था. ट्रेन आगे बढ़ रही थी, लेकिन उसकी नज़रें अब भी उसी प्लेटफॉर्म पर ठहरी थीं, जहाँ कुछ मिनट पहले रिद्धिमा खड़ी थी.
ट्रेन ने रफ्तार पकड़ ली.
रिद्धिमा भीड़ में कहीं खो गई…
लेकिन उसकी खुशबू अभी भी राघव के आसपास थी.
राघव ने अनायास अपनी टीशर्ट को अपने करीब खींचा. कुछ देर पहले जब रिद्धिमा ने विदा लेते हुए उसे गले लगाया था, उसकी हल्की-सी खुशबू उस जैकेट में उतर आई थी. उसने आँखें बंद कर लीं.
ऐसा लगा जैसे वह अब भी उसके कंधे पर सिर रखे खड़ी हो.
तीन दिन…
बस तीन दिन साथ रहे थे दोनों.
लेकिन उन तीन दिनों में उन्होंने महीनों की दूरियाँ जी ली थीं.
कॉफी के छोटे-छोटे कप, लंबी सैरें, बारिश में भीगती सड़कें, बेवजह की हँसी, और विदा के समय चुप हो जाना…
सब कुछ उस खुशबू में जैसे कैद हो गया था. रिद्धिमा हमेशा कहती थी-जानते हो राघव, किसी इंसान की असली पहचान उसकी खुशबू होती है.
राघव हँसकर जवाब देता-चेहरे भूल सकता हूँ… खुशबू नहीं?
वह मुस्कुरा देती. हाँ… क्योंकि खुशबू सीधे दिल तक पहुँचती है.
उस समय राघव ने उस बात पर ध्यान नहीं दिया था.
लेकिन आज…उसे एहसास हो रहा था कि रिद्धिमा सही थी.
कुछ दिनों बाद वह अपने कमरे की अलमारी खोल रहा था.
एक सफेद टी-शर्ट उसके हाथ में आई.यही वह टी-शर्ट थी जिसे उसने उन तीन दिनों में एक शाम पहना था. रिद्धिमा ने मज़ाक में कहा था
इसे मत धोना… इसमें हमारी मुलाक़ात की खुशबू है.उसने हँसते हुए बात टाल दी थी.आज उसने वही टी-शर्ट चेहरे के करीब लाई.
उसे लगा उस कपड़े में रिद्धिमा की हल्की महक आज भी मौजूद है… वह रिद्धिमा को उसके शहर छोड़ तो आया. .लेकिन यादों की खुशबू अब भी वहीं थी. उस दिन पहली बार उसे समझ आया कि इंसानों की महक क्या होती है. वह हमेशा जेहन में बसी रहती है. रिद्धिमा भी उसके जीवन में हंसी छोड़ गई थी…और सबसे ज्यादा अपनी खुश्बू.. अब राघव रिद्धिमा से मिलने का मौका तलाशने लगा.. दिन बीतते गए रिद्धिमा से मिलने की इच्छा हर दिन और गहरी होती जा रही थी…ऑफिस से कोई ऐसा काम भी नहीं निकल रहा था कि वह काम के बहाने जाए और उससे मिल आए.. महीने बीत गए. एक शाम राघव पवेलियन मॉल के क्रॉसवर्ड बुक शॉप में किताबें खंगाल रहा था.. अचानक वही जानी-पहचानी खुशबू हवा में तैर गई. उसका दिल ज़ोर से धड़कने लगा. वह खशबू की दिशा में अनायास आगे बढ़ने लगा…
उसने पलटकर हर चेहरे को देखा. वह रिद्धिमा नहीं थी. शायद किसी और ने वही परफ्यूम लगाया था. लेकिन उस एक पल में राघव फिर से उन तीन दिनों में लौट गया था. उसे एहसास हुआ कि खुशबू स़िर्फ महक नहीं होती.
वह यादों का सबसे सच्चा पता होती है. उस रात उसने रिद्धिमा को संदेश भेजा लिखा-दूरी किलोमीटर में नहीं मापी जाती, रिद्धिमा…दूरी तब महसूस होती है जब हवा तुम्हारी खुशबू लेकर आए और मैं तुम्हें छू भी न सकूँ. अजीब बात है…तुम इतनी दूर हो लेकिन फिर भी मेरी हर साँस में रहती हो. शायद प्रेम का दूसरा नाम ही खुशबू है जो दिखाई नहीं देती, लेकिन पूरी ज़िंदगी साथ चलती है.
उसे अब इंतज़ार था कि रिद्धिमा फिर कब मिलेगी. वह समझ चुका था. कुछ लोग हमारे भीतर बस जाने के लिए आते हैं. और जब भी हवा में उनकी खुशबू घुलती है, लगता है जैसे वे चुपचाप आकर हमारे पास बैठ गए हों. उस रात राघव ने पहली बार दूरी से शिकायत नहीं की. उसने बस गहरी साँस ली… क्योंकि उस साँस में रिद्धिमा थी.

जी वाह बहुत शानदार कहानी है 👌👌🙏