एक जोड़ा चुपचाप शाम के समय एक शांत कमरे में बैठा है, पुरुष अपनी प्रेमिका के पास हाथ रखकर, दोनों के चेहरे पर कोमल भाव, हृदय की धड़कन और नज़दीकी की अनुभूति साफ़ झलक रही है।

चुपचाप, बस तुम्हारे पास

उनके साथ बिताया हर पल कुछ अलग ही होता था। न वो कुछ कहते, न ही जताते, फिर भी उनकी उपस्थिति में सब कुछ पूरा लगता। इंतजार भी मीठा लगता और दिल की धड़कन की रफ़्तार को संभालते हुए, हम बस उनके पहलू में बैठते रहते। शामें इतनी खामोशी से गुजरतीं कि शब्द भी कम पड़ जाते, और हर लम्हा अपने आप में रूह तक पहुँचने वाला एहसास बन जाता। यही वह समय था, जब मौन ही सबसे गहरी बातें कह जाता।

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विरह में डूबी युवती, पायल और कंगन पहने, चाँदनी रात में खिड़की के पास बैठी, आँखों से अश्रुधारा बहती हुई, उदासी और प्रतीक्षा का गहरा भाव।

कैसे आऊँ मैं तुमसे मिलने…

यह रचना और दृश्य विरह के उस क्षण को दर्शाते हैं, जहाँ श्रृंगार, आभूषण और सपने सब धुल चुके हैं, और केवल प्रतीक्षा शेष है। पायल की झंकार और कंगनों की आवाज़ मन की उलझनों का प्रतीक बन जाती है। चाँदनी रात, कोरा काग़ज़ और पहरेदार बनी उदासी सब मिलकर प्रेम की उस पीड़ा को रचते हैं, जहाँ मिलने की चाह सबसे बड़ी व्याकुलता बन जाती है।

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अनकहे प्रेम का भाव दर्शाता एक शांत दृश्य, जहाँ दो लोग बिना बोले आँखों से गहरा भाव साझा कर रहे हैं, वातावरण में मोगरे की हल्की सुगंध और कोमल शांति व्याप्त है।

तुम्हारा–मेरा प्रेम

उस प्रेम की कथा कहती है जो शब्दों का मोहताज नहीं होता। आँखों की गहराइयों में ठहरा, निःस्वार्थ और समान पीड़ा में बंधा यह प्रेम मोगरे की सुगंध की तरह मन में सहेजा रहता है धीरे-धीरे फैलता हुआ, आज भी अव्यक्त, फिर भी अटूट और अभेद्य।

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“खुश और आत्मविश्वासी भारतीय युवा दोस्तों का समूह, आधुनिक जीवनशैली और आपसी सहयोग का प्रतीक”

नया कलेवर नया फ्लेवर

आज की युवा पीढ़ी को अक्सर लापरवाह समझ लिया जाता है, जबकि वे आत्मनिर्भर, संवेदनशील और सहयोगी होते हैं। यह लेख उनकी सोच, जीवनशैली और हमारे मार्गदर्शन की भूमिका को उजागर करता है।

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एक + एक = हम। जहाँ तर्क थक जाता है, वहाँ तुम्हारा नाम मेरी धड़कन बन जाता है।

एक + एक = हम

सुरभि ताम्रकार, लेखिका, दुर्ग गणित पढ़ाः था हमने,अंक गिने, समीकरण सुलझाए,पर तुम्हें देखकर समझ आयाकुछ प्रश्न ऐसे होते हैंजिनका कोई हल नहीं,बस अनुभव होता है|कविताएँ शब्दों से बनती हैं,शब्द अर्थ खोजते हैं,पर तुम्हारी मुस्कानबिना शब्दों केपूरी कविता कह जाती है|गैलीलियो, तुम सच कहते होईश्वर ने ब्रह्मांडगणित की भाषा में लिखा है,पर मेरे हृदय का आकाशउसने…

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शत्रुंजय गिरिराज पालीताणा की सात यात्रा पूर्ण होने पर जैन तपस्वी अंकित बोथरा का बहुमान करते श्रद्धालु, हाथों में ध्वज, कुमकुम-अक्षत से स्वागत और भगवान आदिनाथ के जयकारों के बीच भक्तिमय वातावरण।

घोर तप और संयम की मिसाल बने तपस्वी अंकित बोथरा

शत्रुंजय गिरिराज की दिव्य सात यात्रा पूर्ण, तपस्वी का भावभरा बहुमान सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वॉयर न्यूज महिदपुर रोड।जय आदिनाथ… जय आदिनाथ…भगवान आदिनाथ के मंगलकारी जयकारों से गुरुवार को महिदपुर रोड नगर का कण-कण भक्तिरस में सराबोर हो उठा। अवसर था शत्रुंजय गिरिराज पालीताणा महातीर्थ की चौविहार छठ सहित अत्यंत दुर्लभ एवं पुण्यप्रद सात यात्रा…

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खिड़की के पास अकेली बैठी एक भारतीय महिला, चेहरे पर गहरी उदासी और आंखों में छलकता दर्द. कमरे में हल्की रोशनी और पृष्ठभूमि में धुंधली होती एक पुरुष आकृति, जो दूरी और रिश्ते के टूटने का प्रतीक है. दृश्य भावनात्मक पीड़ा, विश्वासघात और मानसिक अकेलेपन को यथार्थ रूप में दर्शाता है.

कुछ पुरुष ऐसे भी होते हैं

कुछ पुरुष रिश्ते बड़ी आसानी से बनाते हैं और उतनी ही सहजता से तोड़ भी देते हैं. बिना किसी स्पष्टीकरण, बिना किसी टकराव के वे चुप्पी को हथियार बनाकर स्त्री को खुद ही रिश्ते से बाहर निकलने को विवश कर देते हैं. यह लेख उसी मौन छल, टूटते विश्वास और उस स्त्री की मानसिक पीड़ा की कहानी है, जो प्रेम को ईश्वर मान बैठती है और अंत में स्वयं को ठगा हुआ पाती है.

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संवाद और ख़्याल

आज मन संवाद के लिए तरसता है।
मौन और डिजिटल दुनिया के बीच,
वह तेज़ और धीमी रफ्तार वाला संवाद सिर्फ़ मेरी यादों में बचे हैं। आज मैं अपने पायल की छम-छम और शॉवर की बूंदों में उस मौन जुगलबंदी का अनुभव कर रही हूँ।

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कमरे में अकेली व्यक्ति खिड़की के पास बैठा, धुंधली रोशनी में खुद को देखता हुआ, मन में उदासी और अकेलेपन का भाव। कमरे में शांत वातावरण, हल्की धुंध और बांसुरी की कल्पित धुन महसूस होती है।

एकांत की तलाश

आज मन उदास है। रोशनी चुभती है, सितारे दिखना भी नहीं चाहते। वह अकेलेपन में बांसुरी की धुन में शांत होना चाहता है, जहाँ कोई सुनने वाला नहीं और सिर्फ यादें साथ हों।

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खामोश कमरे में अकेली स्त्री खिड़की के पास बैठी बाहर देखती हुई, चेहरे पर प्रतीक्षा और टूटे प्रेम का भाव, शाम की धुंधली रोशनी और उदास वातावरण।

मुख़्तसर मुलाक़ात, लंबा इंतज़ार

यह कविता प्रेम के उस रूप को उजागर करती है जहाँ चाहने वाला टूटता है और जाने वाला वादा लेकर चला जाता है। शब्दों में ठहरा दर्द और अधूरा इंतज़ार इसकी आत्मा है।

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