Live Wire News literary portal with Gulmohar and Rajnigandha flowers
एक आत्मविश्वासी भारतीय महिला खुले आकाश के नीचे खड़ी है, एक हाथ में किताब और दूसरे में तलवार का प्रतीकात्मक रूप, चेहरे पर दृढ़ता और गरिमा का भाव।

नारी

“नारी” एक प्रेरणादायक हिंदी कविता है जो स्त्री को शक्ति, साहस, गरिमा और सृजन की आधारशिला के रूप में प्रस्तुत करती है। यह रचना नारी के मातृत्व, संघर्ष, शिक्षा, विज्ञान और आत्मरक्षा में अग्रणी स्वरूप को सम्मानपूर्वक नमन करती है।

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बूँदों की पदचाप…

मैं ध्यानमग्न होकर आज वर्षा की बूँदों की पदचाप सुन रही हूँ। ये बूँदें जैसे कोई देववधू बनकर घूँघट काढ़े आई हों और धरती से मधुर आलिंगन कर उसका संताप हर रही हों। मिट्टी में मिलकर अंकुरित होने लगीं, मानो जीवन की नई कोंपलें फूटने लगी हों। पूरी प्रकृति जैसे किसी रचनात्मक क्रीड़ा में सम्मिलित हो गई हो। इन बूँदों ने तन-मन को धोकर शुद्ध कर दिया, और भीतर की Maya को खोज निकाला। प्रत्येक बूँद अब एक मोती बन गई है, जिसे मन सहेज रहा है, मानो किसी गूढ़ तत्व से मिलने का जाप हो रहा हो।

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महिला स्वास्थ्य पर महिला विमर्श कार्यक्रम संपन्न

शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, उज्जैन एवं शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, महिला कार्य, उज्जैन के संयुक्त तत्वावधान में महिला विमर्श कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का विषय “महिला स्वास्थ्य: सर्वोच्च प्राथमिकता” रहा।

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सफ़ेद में लिपटी लड़की

वह लड़की ज़िंदगी को प्रेम की तरह जीना चाहती थी .शहर की भागदौड़ से दूर, पहाड़ों और जंगलों के बीच, हवा में बाँसुरी की धुन सुनते हुए। उसके हाथ में हमेशा पेन रहता, और हर शब्द उसके दिल की गहरी भावना बन जाता। वह जानती थी कि मौत भी तभी खूबसूरत होगी, जब वह लिखते-लिखते उसे मिले. जैसे जीवन का हर पल उसके प्यार और उसकी स्याही में समा गया हो।

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बड़ा बैनजी श्यामलता शर्मा: एक युग का अंत

बड़ा बैनजी- श्यामलता शर्मा

महिदपुर रोड की 95 वर्षीय सेवानिवृत्त शिक्षिका श्यामलता शर्मा, जिन्हें पूरा क्षेत्र “बड़ा बैनजी” के नाम से जानता था, अब हमारे बीच नहीं रहीं। बेटियों की शिक्षा के लिए उनका संघर्ष, उनका स्नेह और उनकी रोशन मुस्कान पीढ़ियों तक याद की जाएगी।

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आज भी है…

तेरी चाहत आज भी मेरे पहलू में जिंदा है। तू अपनी ज़िंदगी में मुझे कभी मयस्सर न हुआ, लेकिन मेरे खयालों में तू आज भी मौजूद है। मैं तेरी यादों को अक्सर रुख़सत कर देती हूँ, लेकिन वे ख्वाबों की दहलीज़ पर दस्तक देकर फिर लौट आती हैं। मुद्दतें बीत गईं, दिन ढले, रातें गुज़रीं, मगर सीने में वही खलिश आज भी बाकी है। दिल अक्सर कहता है कि रूबाइयों के कुछ पल मेरे हिस्से में भी होंगे, और मैं उन लम्हों की आस में जीती रहती हूँ। तेरी यादों को मैं तकिए के नीचे महफूज़ रख देती हूँ, मगर आँसुओं से वह तकिया आज भी भीगता रहता है।

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अपने पति के नाम दर्द और अधूरे प्रेम से भरा पत्र लिखती एक भारतीय स्त्री का भावुक दृश्य

एक खत देवांश के नाम

क स्त्री का अपने पति के नाम लिखा गया यह मार्मिक पत्र उसके जीवन के उन अनकहे दर्दों को उजागर करता है, जो प्रेम की चाह, उपेक्षा और रिश्तों की खामोशी के बीच धीरे-धीरे उसे भीतर से तोड़ देते हैं।

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alt text: Two hands gently holding a symbolic thread representing relationships, warm emotional atmosphere, soft light, trust, balance, connection, meaningful human bond, realistic artistic scene.

रिश्तों की डोर

स्वरा सुरेखा अग्रवाल (उत्तरप्रदेश) रिश्तों की डोर दोनों ओर से मजबूत होनी चाहिए। जितने ज़्यादा रिश्ते, उतनी डोर झुकेगी। रिश्तों की गति मद्धम होनी चाहिए, फास्ट नहीं, ज़रा स्लो रखिए। गर्माहट की तपिश स्निग्ध हो, पकड़ कोज़ी हो, चाशनी कम और कड़वाहट मनमोहक—यानी संतुलन ज़रूरी है। बांधिए भी उतना कि घुटन न हो, पकड़िए भी…

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“बालकनी में खड़ी स्वतंत्रता तलाशती महिला”

उड़ेगी एक दिन वो…

यह कविता एक स्त्री की कहानी है, जिसे परिंदे के रूपक में प्रस्तुत किया गया है। यह केवल उड़ान की बात नहीं, बल्कि उस मानसिक और सामाजिक कैद की कहानी है, जिसमें अक्सर महिलाओं को सीमित कर दिया जाता है। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। धीरे-धीरे वह फिर से अपने अस्तित्व को पहचानती है, छोटे-छोटे कदमों से खुद को संभालती है और उड़ना सीखती है। यह यात्रा आसान नहीं है यह डर, झिझक और आत्मसंघर्ष से भरी है लेकिन हर कोशिश उसे उसके असली आसमान के करीब ले जाती है।

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