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क्या होता है आखिर

जीवन में सब कुछ पाना शायद ही कभी संभव होता है। हर बार कुछ न कुछ बच जाता है — पूरा भर जाने के बाद भी रिक्तता का अनुभव बना रहता है। यह कुछ ऐसा है जैसे काले बादलों की ओंट में बचा थोड़ा सा पानी, या भोर की हल्की रोशनी में मिली रात की सहमी-सी कहानी।

प्रिय से मिलने के बाद उसका इंतजार, कटे हुए दरख़्त में फूटती नई हरित कोपलें, सुनसान जंगल में पंछियों के घोंसले, मंदिर की मूर्ति को बार-बार निहारने की इच्छा — ये सब दर्शाते हैं कि कुछ भी कभी पूरा नहीं होता। हमेशा कुछ-न-कुछ बच जाता है, आस-पास ही, जिसे महसूस करना और जीना ही जीवन का सच है।

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माँ और बेटी का भावुक दृश्य, बेटी अपनी माँ को लाल लिपस्टिक लगाते हुए, जीवन में रंग लौटने का प्रतीक

न्यूड लिपस्टिक

नई उम्र में ही रंजू की दुनिया जैसे अचानक रंगहीन हो गई थी। जिस आईने के सामने वह कभी सजती-संवरती थी, अब उसी आईने में उसे अपना चेहरा भी अजनबी सा लगता था। बारहवें के दिन जब ननद उसके लिए श्रृंगार का सामान लेकर आई, तो उसके भीतर दबा हुआ सारा दर्द आँसुओं में बह निकला“अब इन सबका क्या करूँ दीदी?”

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A diverse group of Indian people, including children, adults, and senior citizens, practicing yoga together in a green park at sunrise, promoting health, wellness, and community spirit.

योग करो, स्वस्थ रहो

योग करो, स्वस्थ रहो” एक प्रेरणादायक कविता है जो योग के महत्व, स्वस्थ जीवन, मानसिक शांति और निरोग भारत के संदेश को सरल एवं प्रभावशाली शब्दों में प्रस्तुत करती है। यह कविता सभी को दैनिक जीवन में योग अपनाने और स्वस्थ समाज के निर्माण का संकल्प लेने के लिए प्रेरित करती है।

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कालरात्रि माँ

“गर्दभ वाहन पर विराजित, खड्ग-खप्परधारी कालरात्रि माँ, शत्रु का दमन करने वाली और भक्तों को समृद्धि देने वाली माता। सप्तम दिन पूजा करने से दूर होती हैं बाधाएँ, और अर्पित रक्त पुष्प व शहद से होती है शुभ फलप्राप्ति।”

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वृद्धाश्रम की बेंच पर अकेली बैठी एक बुजुर्ग महिला, हाथ में माला, चेहरे पर उदासी और आंखों में गहरी सोच, शांत और भावुक वातावरण।

बुढ़ापे की व्यथा

“बुढ़ापे की व्यथा” एक मार्मिक कविता है जो वृद्धाश्रम में बैठे माता-पिता की पीड़ा, उपेक्षा और टूटते पारिवारिक मूल्यों की करुण सच्चाई को उजागर करती है। यह रचना समाज को आईना दिखाती है और संतान को अपने कर्तव्यों की याद दिलाती है।

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एक भारतीय दृष्टिदिव्यांग महिला रेडियो स्टूडियो में हेडफोन पहनकर माइक्रोफोन के सामने आत्मविश्वास के साथ बोलती हुई, प्रेरणा और आत्मनिर्भरता का प्रतीक

लक्ष्मी : एक आवाज़ जो बदल रही है सोच

देहरादून की शांत वादियों से उठी एक आवाज़ आज समाज की सोच को चुनौती दे रही है. यह कहानी है लक्ष्मी कीभारत की पहली सर्टिफाइड दृष्टि दिव्यांग (विजुअली इम्पेयर्ड) रेडियो जॉकी, जिन्होंने न केवल अपनी पहचान बनाई, बल्कि समाज के स्थापित पूर्वाग्रहों को भी तोड़ने का साहस दिखाया.

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बचपन की दीवाली : यादों की मिठास

बचपन की दीवाली में हर चीज़ में मज़ा और उत्साह होता था—धूप में फूलते गद्दे, मम्मी-चाची का त्योहार नाश्ता, और पापा का हाथ का फ्रूट क्रीम। आज की सुविधाओं के बावजूद वह मासूमियत और उत्सुकता कहीं खो सी गई है, लेकिन यादें हमेशा हमारे दिलों में जिंदा रहती हैं।

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“लहरों की सखी”

यह कविता आत्मसंवाद और जीवन की गहराई का प्रतीक है। कवयित्री ने लहरों को अपनी सखी — यानी आत्मीय साथी — के रूप में देखा है। लहरें यहाँ सिर्फ समुद्र की गतिशीलता नहीं, बल्कि जीवन के उतार-चढ़ाव, भावनाओं की लय और त्मविश्वास की स्थायी धारा का प्रतीक हैं। जब कवयित्री कहती हैं “लहरों को बाहों में समेटे हुए मैं, अथाह समंदर को समेटती हुई”, तो यह अपने भीतर की असीम शक्ति और प्रेम को पहचानने की यात्रा बन जाती है।लहरें उन्हें उनकी परछाई दिखाती हैं, यानी स्वयं से मिलने का अवसर देती हैं।वे जीवन के सफर की गवाह हैं, जो कवयित्री को कभी भटकने या बहने नहीं देतीं. बल्कि उन्हें दृढ़, स्थिर और प्रेममय बनाए रखती हैं।

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बदलता वक़्त कविता में दर्शाई गई समाज की पीड़ा और इंसानियत का क्षरण

बदलता वक़्त…

“बदलता वक़्त” एक मार्मिक हिंदी कविता है, जो टूटते रिश्तों, बढ़ती हैवानियत, अख़बारी सुर्खियों की लाल स्याही और समाज में गिरती इंसानियत को संवेदनशील शब्दों में उजागर करती है।

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शहर में अपने लापता बेटे की तलाश करती बिहार की एक संघर्षशील माँ

तलाश

बिहार के एक छोटे से गाँव की सावित्री अपने लापता बेटे की तलाश में शहर पहुँच जाती है। अनेक कठिनाइयों और संघर्षों के बावजूद वह हार नहीं मानती और अपनी ममता की ताकत से अपने बेटे को ढूँढ़ निकालती है। यह कहानी माँ के अटूट प्रेम और साहस का अद्भुत उदाहरण है।

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