सुबह की रोशनी में लकड़ी की मेज पर रखा गर्म चाय का कप, हल्की भाप उठती हुई, पास में चाय की पत्तियां और शांत वातावरण

चाय: एक कप में सेहत, सुकून और लंबी उम्र का राज

चाय सिर्फ एक पेय नहीं, बल्कि सेहत और सुकून का मेल है. सही समय, सही तापमान और सही मात्रा में पी गई चाय दिल, मेटाबॉलिज़्म और इम्युनिटी को मजबूत बनाती है, जबकि गलत आदतें इसके फायदे को नुकसान में बदल सकती हैं. यह लेख बताता है चाय पीने का वैज्ञानिक और स्वास्थ्यवर्धक तरीका.

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पूजा सामग्री की दुकान में आपस में चर्चा करती दो कौड़ियाँ और पास में हँसता हुआ कॉकरोच, जो सामाजिक और मीडिया व्यंग्य का प्रतीक है।

उलझन

जब कौड़ियाँ चर्चा का विषय बन जाएँ, पत्रकार और शिक्षक आमने-सामने खड़े हो जाएँ और कॉकरोच हँसने लगें, तब जन्म लेता है एक ऐसा व्यंग्य जो समाज की विडंबनाओं को आईना दिखाता है।

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खामोश चीख और मां का विश्वास

शुरू शुरू में मुझे विवेक सर से बहुत डर लगता था लेकिन धीरे-धीरे मुझे उनके स्पर्श की आदत हो गई और मैं उनके साथ सहज होने लगी थी, मुझे नहीं पता कि वह स्पर्श मुझे अच्छा लगता था या बुरा लगता था ? मां को बताना चाहती थी पर डरती थी , सोचती थी मां पापा मेरे बारे में क्या सोचेंगे ….. क्या विवेक सर मुझे प्यार करते हैं ? …… कैसा प्यार है यह ?

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राम भक्त हनुमान दिव्य छवि

राम भक्त हनुमान

राम भक्त हनुमान पर आधारित यह भावपूर्ण हिंदी कविता उनकी भक्ति, शक्ति और संकट मोचन स्वरूप का सुंदर वर्णन करती है। पवनपुत्र की महिमा को समर्पित यह रचना आस्था और श्रद्धा से भर देती है।

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दौड़

**Blurb:**

कहानी *“रेस”* आधुनिक प्रकाशन जगत की उस कड़वी सच्चाई को उजागर करती है जहाँ प्रतिभा नहीं, नाम बिकता है। एक साधारण लेखिका की शानदार कहानी केवल इसलिए अस्वीकृत कर दी जाती है क्योंकि उसके पास कोई पहचान नहीं। संपादक के लिए रचनाएँ नहीं, “ब्रांड” मायने रखते हैं। सहायक आलोक के भीतर उठता द्वंद्व और अंत में उसकी मजबूर चुप्पी – यही इस कहानी का दर्द है। यह सिर्फ एक दफ्तर का दृश्य नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की झलक है जहाँ शब्दों की जगह प्रसिद्धि का शोर गूँजता है।

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ग़ज़ल 

जब दिल के मचलते भाव किसी अक्षर को ढूँढ लेते हैं, तो उन्हें बयान करने का अंदाज़ भी खोज लिया जाता है। जिन्हें उड़ने की चाहत होती है, वे पर ढूँढ लेते हैं और ज़मीन पर रहते हुए भी अपना आसमान पा लेते हैं। बच्चे बिना समझे पराए के अंतर को भी पहचान लेते हैं। उन्हें कमजोर करना आसान नहीं होता, क्योंकि अँधेरे में भी वे अपने मार्ग को प्रकाशमान बना लेते हैं। जो अपनी किस्मत खुद लिखते हैं, उन्हें अपने प्रयास पर विश्वास होता है और अवसर अपने आप ढूँढ लेते हैं। जिनके लिए मकान पक्का हो या न हो, वे सियासत के ज्वलनशील शोले भी पार कर लेते हैं। यह शरीर मिट्टी का बना है और मिट्टी में ही लौटना है, फिर भी वे अपनी आत्मा के दूसरे रूप को खोज लेते हैं। जब तक साँस चलती है, अर्चना को भी फुर्सत नहीं होती, फिर भी कुछ पल के लिए सुकून पा लेते हैं।

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“1990 के दशक का भारतीय घर जिसमें टेपरिकार्डर, कैसेट और मटके पर रखा स्पीकर देसी जुगाड़ साउंड सिस्टम के रूप में इस्तेमाल हो रहा है”

बेबी को बेस पसंद है

स सिर्फ़ आवाज़ नहीं होता, वह एक जुनून होता है। टेपरिकार्डर, कैसेट और जुगाड़ से पैदा हुआ वह गूंजता बेस, जो साधारण मशीन को भी महफिल बना देता था। मटके पर उल्टा रखा स्पीकर सिर्फ़ प्रयोग नहीं था, वह उस दौर की रचनात्मक ज़िद थी जहाँ साधन कम थे, पर शौक़ और शरारत दोनों भरपूर थे। और हाँ, घर से थोड़ी दूर रहने वाली ‘बेबी’ को भी वही बेस पसंद था।

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…जब कपड़ा लंबा-सिलता था और बचपन भी

आलमारी खोली तो कपड़े बहुत थे, पर एक भी प्रेस किया हुआ नहीं। कपड़ों का ढेर देखते ही बाबूजी याद आ गए जब साल में बस दो बार नए कपड़े सिलते थे। बसंती दा से उधारी में कपड़ा लेना, टेलर की दुकानों के चक्कर, “थोड़ो लंबो-जंबो सिलजो, बच्चा बढ़ रहा है” की आवाज़, और नए कपड़ों के इंतज़ार का उत्साह… आज भले मॉल में पहनकर घर आ जाएं, पर वो इंतज़ार, वो खुशी, अब कहीं नहीं मिलती।

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मकाँ

एक जर्जर मकाँ खंडहर की तरह ढहता दिखाई देता है। कभी उसी छत के नीचे बच्चों की चहचहाहट गूँजती थी, माँ और बाबा की बातें घर को जीवंत बना देती थीं। आज वातावरण उदासी और रंजो-ग़म से भरा है, मानो साँसें भी उखड़-सी गई हों। दिल बार-बार उसी पुराने आशियाने को ढूँढता है, जहाँ अपनापन और जीवन की गर्माहट हुआ करती थी।

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महिदपुर रोड जैन समाज शासन स्थापना दिवस

श्रद्धा और उल्लास से मनाया शासन स्थापना दिवस

महिदपुर रोड में जैन समाज ने वैशाख सुदी ग्यारस पर शासन स्थापना दिवस मनाते हुए श्री सुविधिनाथ जैन मंदिर में शासन ध्वज फहराया और सामूहिक आराधना की।

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