देवदूत बन गए पंकज यादव

ट्रैफिक आरक्षक पंकज यादव ने अपने कर्तव्य के प्रति अदम्य साहस दिखाते हुए कालानी नगर से तेज़ रफ्तार ट्रक को बड़ा गणपति सिग्नल तक रोकने की कोशिश की। ट्रक के नीचे फँसी बाइक और उसमें सवार युवक की जान खतरे में थी, लेकिन यादव और राहगीरों की सूझबूझ ने बड़े हादसे को टाल दिया।

यादव कहते हैं, “मैंने किसी पुरस्कार के लिए नहीं किया, बस ड्यूटी निभाई। मेरा मन यही सोच रहा था कि ट्रक को कैसे भी रोकूं।’’इस घटना में उनकी हिम्मत और आसपास के लोगों की तत्परता ने कई जानें बचाईं और सच्चे साहस की कहानी पेश की।

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अकेले हैं, तो क्या ग़म है…

अकेलापन अंत नहीं, एक नया आरंभ है। यह वह समय है जब आप खुद को, अपनी रुचियों को और अपने जीवन के अनुभवों को नए सिरे से जी सकते हैं।अकेले होने का अर्थ यह नहीं कि आप असहाय हैं, बल्कि इसका अर्थ है कि अब आपके पास स्वयं को समझने और जीवन को अपने तरीके से जीने का अवसर है।

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बरसाती शाम में कसारी से महिदपुर रोड के सुनसान कच्चे रास्ते पर दूध की केटली लिए चलता बालक और दूर दिखाई देती सफेद परछाई।

भूत समझा, माइलस्टोन निकला

महिदपुर रोड और कसारी के पुराने सुनसान रास्तों की पृष्ठभूमि में लिखा यह संस्मरण बचपन के डर, ग्रामीण जीवन और कल्पना की उड़ान को जीवंत करता है। एक सफेद परछाई, भूत का भ्रम और अंत में उसका माइलस्टोन निकलना—कहानी को रोचक और भावनात्मक बना देता है।

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अब मैं खाली हूँ…

भावनात्मक टूटने और भीतर के खालीपन को मार्मिक ढंग से चित्रित है। शुरुआत में बहुत समझाने, सवाल करने और दूरी मिटाने की कोशिश की, लेकिन समय के साथ शब्द थक गए, मन बुझने लगा और शिकायतें भीतर ही दब गईं। अब उसके दिन रसोई की भाप, बरामदे की धूल और घड़ी की टिक-टिक में गुजरते हैं—साथी के साथ नहीं, बल्कि अकेलेपन में।
जब साथी पुरानी यादों और अधूरे वादों के साथ लौटता है, तो भीतर कोई उत्साह या उम्मीद नहीं जागती। आँगन का चाँद, दीपक और हथेलियों का उजाला बहुत पहले खो चुके हैं। वक्ता अब खुद को एक खाली घर मानती है, जहाँ साथी महज़ मेहमान है और प्रेम एक पुरानी वस्तु बनकर कहीं सुरक्षित रख दिया गया है।

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river

नदी के आँसू

दी रोती भी है—पर पहाड़ उसकी आँखों के आँसू देख ही कहाँ पाते हैं। वो अपनी ऊँचाई की अकड़ में तने रहते हैं। उन्हें लगता है नदी तो बस बादलों की आवारा सखी है, बहती है, गुज़रती है… बस।

पर हक़ीक़त यह है कि पहाड़ की ऊँचाई को हरियाली, जीवन, शब्दसब कुछ नदी ही देती है। वही उसके अस्तित्व को अर्थ देती है। ऊँचाई अकेली कुछ नहीं होती गहराई चाहिए। और गहराई नदी ही देती है।

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एक व्यक्ति शांत वातावरण में डायरी लिखते हुए, मन की गहराई को व्यक्त करता हुआ

मन की कही

“मन की कही” एक भावनात्मक और आत्मचिंतन से भरी हिंदी रचना है, जो मन की उन अनकही बातों को व्यक्त करती है जिन्हें हर किसी से साझा नहीं किया जा सकता। यह लेख विश्वास, आत्मीयता और मौन के महत्व को उजागर करता है, और बताता है कि क्यों हर दिल हमारे रहस्यों का भार नहीं उठा सकता। अंत में यह संदेश देता है कि एक पुस्तक ही सबसे सच्ची और निस्संदेह साथी बन सकती है।

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इंदौर कंपोस्ट सिस्टम: खेतों से लंदन तक की गूंज

“जिन अंग्रेजों के ज्ञान को हम श्रेष्ठ मानते हैं, उन्हें जैविक खाद का ज्ञान बिहार और इंदौर के अनपढ़ किसानों ने दिया था। यही कारण है कि ‘इंदौर कंपोस्ट सिस्टम’ को वैश्विक पहचान मिली और गांधीजी स्वयं इसे समझने इंदौर आए। 1925 में अल्बर्ट हॉवर्ड ने इंदौर में कंपोस्ट खाद पर शोध कर पूरी दुनिया को प्राकृतिक खेती का संदेश दिया। सौ साल पहले भारतीय किसान पेड़ों की पत्तियों, गोबर और प्राकृतिक अवशेषों से जो खाद बनाते थे, वही आज भी मिट्टी की सेहत के लिए सबसे उपयोगी है। इंदौर नगर निगम ने भी इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अपने वार्डों में कंपोस्ट खाद प्लांट लगाकर आधुनिक नगरीय कृषि में नया अध्याय जोड़ा है।”

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मोबाइल फोन में व्यस्त परिवार के सदस्य, एक ही घर में अलग-अलग कमरों में स्क्रीन देखते हुए लोग

रिश्ते ऑनलाइन, एहसास ऑफलाइन

आजकल रिश्ते घरों में कम और मोबाइल स्क्रीन पर ज़्यादा दिखाई देते हैं। दोस्त, नाते-रिश्तेदार और पड़ोसी सब डिजिटल दुनिया में सक्रिय हैं, जबकि वास्तविक जीवन में दूरी बढ़ती जा रही है। यह व्यंग्यात्मक लेख सोशल मीडिया, व्हाट्सऐप विश्वविद्यालय और आभासी संबंधों के माध्यम से आधुनिक समाज की विडंबना को उजागर करता है। लेख यह प्रश्न उठाता है कि क्या वाकई डिजिटल दुनिया उतनी ही रोचक है जितनी दिखती है?

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मां कुष्मांडा की स्तुति

“बुध ग्रह की स्वामिनी, ममता का रूप धारण करने वाली मां कुष्मांडा, भक्तों को रूप-बुद्धि प्रदान करती हैं और अष्टभुजा से दुष्टों का संहार करती हैं। नवरात्रि के चतुर्थ दिवस पर पीले रंग का पूजन, केसर पेड़ा और मालपुए का भोग अति प्रिय है।”

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सिंहस्थ 2028 में उज्जैन पहुंचने से पहले रोकी जाएंगी ट्रेनें, रेलवे की नई रणनीति

सिंहस्थ 2028: उज्जैन स्टेशन से पहले रोकी जाएंगी ट्रेनें

आगामी सिंहस्थ 2028 को लेकर रेलवे ने अपनी रणनीति स्पष्ट कर दी है। इस बार फोकस केवल इंफ्रास्ट्रक्चर पर नहीं, बल्कि भीड़ नियंत्रण और यात्री प्रबंधन पर है। इसी के तहत उज्जैन मुख्य स्टेशन पर दबाव कम करने के लिए ट्रेनों को शहर के बाहर ही रोकने की योजना बनाई गई है।

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