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अहंकार में डूबा व्यक्ति, चारों ओर धूल और धुंध, पीछे जलती हुई बगिया और प्रतीकात्मक अराजकता

आत्ममुग्धता

धूल जब गगन को छूती है, तब भी एक कंकर अपनी ही धुन में डूबा रहता है यही आत्ममुग्धता है। इस दुनिया में कई लोग अपने अहंकार के कहकहे लगाते हैं, बिना यह देखे कि उनकी ही कारगुजारियाँ उनके आसपास के चमन को जला रही हैं। वे उस बगिया को बारूद बना देते हैं, जिसे प्रेम और बलिदान से सींचा गया था यही हमारी सामाजिक विडंबना है।

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महाभारत की सभा में द्रौपदी की करुण पुकार, भगवान कृष्ण द्वारा चीर रक्षा का दिव्य दृश्य

द्रौपदी की करुण पुकार

सभा के मध्य खड़ी द्रौपदी की आँखों में भय, अपमान और आक्रोश एक साथ उमड़ रहे थे। चारों ओर सत्ता के प्रतीक उपस्थित थे, पर न्याय कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। शकुनि के छल से आरंभ हुआ यह खेल अब उसकी अस्मिता पर आकर ठहर गया था। दुर्योधन की क्रूर मुस्कान और दुःशासन की निर्दयता ने सभा को और भी भयावह बना दिया था।
भीष्म और धृतराष्ट्र जैसे महान भी मौन थे, मानो धर्म स्वयं बंधन में जकड़ा हो। उस असहाय क्षण में द्रौपदी के भीतर से केवल एक ही पुकार उठी—कृष्ण। उसने अपने समस्त अहंकार, भय और पीड़ा को त्यागकर स्वयं को पूर्णतः उस परम शक्ति के हवाले कर दिया। और तभी, जब मानवता ने साथ छोड़ दिया, आस्था ने उसका हाथ थाम लिया—अदृश्य होकर भी कृष्ण उसकी लाज की रक्षा के लिए उपस्थित हो गए।

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कृष्ण और कृष्ण प्रिया

वह स्वयं को हर रूप में देखता है वामन, नरसिंह, माधव, नंदलाल एक ही सत्ता, अनेक लीलाएँ। और उसके सामने खड़ी है ‘कृष्ण प्रिया’, जिसकी पहचान केवल उसकी भक्ति है। ग्वालिन के वेश में, आँखों में प्रेम और अधरों पर पुकार लिए, वह बस इतना चाहती है कि कृष्ण नाम में खो जाए। उसके लिए वही तिलक है, वही श्रृंगार, वही जीवन। अंत में उसकी एक ही विनती रह जाती है. “जब मैं कहूँ… आओ न स्वामी, तो तुम आ जाना।”

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गुरुकुल उत्सव 2026 में झलकी संस्कृति और प्रतिभा

महिदपुर रोड के गुरुकुल मानस एकेडमी में आयोजित गुरुकुल उत्सव 2026 में 350 विद्यार्थियों ने भगवान श्रीकृष्ण थीम पर आधारित मनमोहक प्रस्तुतियों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। भक्ति, संस्कृति और प्रतिभा के इस अद्भुत संगम ने पूरे वातावरण को उत्साह और गर्व से भर दिया।

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माँ काली का करुणामय रूप, अपनी भक्त बेटी को आशीर्वाद देती हुई

मेरी प्यारी काली माँ

यह कविता माँ काली के साथ एक बेटी के गहरे आत्मीय रिश्ते को दर्शाती है, जहाँ देवी माँ कभी मित्र, कभी माँ, तो कभी मार्गदर्शक बनकर जीवन में शक्ति और सहारा देती हैं।

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अकेला व्यक्ति अपने टूटे दिल और भावनात्मक दर्द के साथ अंधेरे में बैठा हुआ

अंतर्मन की वेदना

“अंतर्मन की वेदना” एक ऐसी कविता है जो टूटे हुए जज़्बातों और आत्मिक पीड़ा को गहराई से व्यक्त करती है। यह दिखाती है कि कैसे अति संवेदनशीलता कभी-कभी इंसान को भीतर से तोड़ देती है और जीवन उसे कठोर बनना सिखा देता है।

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मंच की चमक के पीछे छिपा सच और अकेला खड़ा एक लेखक

“हाय… क्या हो रहा है…

यह कविता समाज के उस बदलते चेहरे को उजागर करती है जहाँ सच बोलने वाले खामोश कर दिए जाते हैं और मंचों पर समझौते बिकते हैं। यह कलम की ईमानदारी और दिखावे की दुनिया के बीच का तीखा टकराव है।

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बांसुरी बजाते हुए वृंदावन में खड़े श्रीकृष्ण का दिव्य और शांत स्वरूप

करुणा सागर

यह कविता श्रीकृष्ण के विविध रूपों और भक्तों के साथ उनके दिव्य संबंधों को दर्शाती है। मीरा से लेकर द्रौपदी तक, हर भक्त की पुकार में कृष्ण की करुणा और प्रेम झलकता है।

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अंधेरे कमरे में घुसता हुआ उजाला जो छिपी हुई सच्चाइयों को उजागर कर रहा है

उजाले की ओर

“उजाले की ओर” एक प्रतीकात्मक लघुकथा है, जिसमें अंधकार और प्रकाश के टकराव के जरिए समाज की छिपी बुराइयों को उजागर किया गया है। यह कहानी बताती है कि सच का प्रकाश जब फैलता है, तो अंधेरा टिक नहीं पाता।

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महंगाई से परेशान आम आदमी और बढ़ती कीमतों का प्रतीकात्मक दृश्य

बढ़ती महंगाई

यह कविता नारद जी और महंगाई के संवाद के माध्यम से समाज की विडंबना को उजागर करती है। महंगाई खुद को निर्दोष बताती है और असली जिम्मेदारी सत्ता और व्यवस्था पर डालती है जो इस व्यंग्य को और भी प्रभावशाली बनाता है।

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