
मंजुला श्रीवास्तवा
यूँ तो मैंने रोज नए सूरज देखे हैं,
पर कल के सूरज की और ही बातें होंगी।
नई उमंगें और सौगातों की रातें होंगी,
कुछ वादे, कुछ शिकवे की बातें होंगी।
यूँ तो मैंने…
दूर फलक पर कोहरे के साए होंगे,
पर भोर किरण की लाली मुस्काएगी।
मुंडेरों पर ओस कणों की बूँदें होंगी,
पर फुदके गौरयों के पंख भी गीले होंगे।
यूँ तो मैंने…
दूर कहीं अंधियारी में जुगनू चमके होंगे,
बदली में चाँदनी चुपके से झाँकेगी।
थकती रजनी भी उजालों को पुकारेगी,
दूर क्षितिज पर पंछी स्रष्टा को नमते होंगे।
यूँ तो मैंने…
कहीं कोई अंकुर प्रकाशित हवा में तैरे होंगे,
कहीं कोई अश्रु अग्नि बन धधके होंगे।
कहीं विरही फटा कलेजा ले आकाश निहारे होंगे,
कहीं कोई हाथ दुआ के सजदे में उठे होंगे।
हर अंत का प्रारंभ लिए, रोज नए सूरज देखे हैं,
यूँ तो मैंने..
