मेरी प्रिय सखी यामिनी
यह लेख दो सहकर्मियों की ऐसी आत्मीय मित्रता की कहानी है, जो समय, दूरी और परिस्थितियों के बावजूद विश्वास, सहयोग, प्रेम और अपनत्व की मिसाल बनी हुई है।

यह लेख दो सहकर्मियों की ऐसी आत्मीय मित्रता की कहानी है, जो समय, दूरी और परिस्थितियों के बावजूद विश्वास, सहयोग, प्रेम और अपनत्व की मिसाल बनी हुई है।
*“असुंदर है”* समाज के विकृत चेहरों को उजागर करने वाली रचना है। कवि ने इस कविता में बार-बार “असुंदर है” कहकर हमारे भीतर और हमारे समाज में फैली उन कुरूप सच्चाइयों की ओर ध्यान दिलाया है, जिन्हें हम सामान्य मानकर अनदेखा करते रहते हैं।
कवि कहता है कि असुंदर है जब मनुष्य, मनुष्य के साथ भेदभाव करता है — किसी को महान और किसी को तुच्छ समझता है। यह असुंदर है जब पुरुष को मोक्ष का अधिकारी माना जाता है और स्त्री को पैरों की जूती समझा जाता है। असुंदर है जब पत्थरों को ईश्वर कहा जाता है, लेकिन मनुष्यों के साथ पशुओं जैसा व्यवहार किया जाता है।
गाँव के बीच मंदिर बनाना और कुछ लोगों को गाँव के बाहर बसाना भी असुंदर है। पत्थरों की पूजा करते हुए उन्हीं पर पशुओं की बलि चढ़ाना और जाति-धर्म के नाम पर लोगों को बाँटकर आपस में लड़ाना भी असुंदर है।
चांदनी का यह पहला करवा चौथ था, लेकिन उसका पति चन्दन उसके साथ नहीं था। शादी को अभी साल भी पूरा नहीं हुआ था और चंदन को हेड ऑफिस के बुलावे पर अपनी ड्यूटी पर जाना पड़ा। उदास चांदनी को सासुमा ने प्यार से समझा-बुझाकर नई लाल सिल्क साड़ी और गहने दिलवाए।
जब चांद निकला, चांदनी ने छलनी से उसे देखा और अपने पति की याद में मनुहार की। तभी सही वक्त पर वीडियो कॉल आया — चंदन मुस्कुराते हुए सामने था। खुशी और प्यार से भरी यह पल सभी सुहागिनों के लिए भी आनंदमय था। सासू मां ने आशीर्वाद देते हुए कहा, “इन्हें किसी की नज़र न लगे, इनके बीच अटूट प्यार बना रहे।”
एक छोटी-सी सल्तनत, कुछ किताबें, एक बिस्तर और दो दिल—इस कहानी में प्रेम के वे पल कैद हैं जो हँसी और आँसुओं के बीच कहीं मुकम्मल होते हैं। कभी झिझक, कभी झेंप, और एक आलिंगन—जो बरसों बाद भी उतना ही सुकून देता है जितना पहली बार।
जब राजेश खन्ना का जादू ढल रहा था और अमिताभ बच्चन का दौर उभर रहा था, तब कस्बाई जवानी भी बड़े परदे की नकल में अपने सपने सिलवा रही थी। महिदपुर रोड पर फैशन का मतलब था मुख्यत्यार भाई की बेलबॉटम की मोरी, जमीन से रगड़ खाती पैंट और उसे बचाने के लिए लोहे की चेन का अनोखा जुगाड़। यह सिर्फ पहनावा नहीं था, बल्कि उस समय की जवानी का स्वाभिमान, जिद और रचनात्मकता थी, जिसने छोटे शहर को भी अपने तरीके से ‘स्टाइलिश’ बना दिया।
यह कविता बसंता और वसंत के प्रतीक के माध्यम से श्रम, विस्थापन और जीवन के असंतुलन को दर्शाती है। सौंदर्य, पर्यटन और संघर्ष के बीच का कटु यथार्थ इसमें मुखर है।
यह कविता हर उस लड़की के नाम है, जो सिंगार के साथ संघर्ष करना, रिश्तों के साथ अपनी पहचान बचाए रखना और किसी के सहारे के बजाय अपने सपनों के सहारे आगे बढ़ना चाहती है।
इस कविता में एक स्त्री अपने जीवन के उस मोड़ पर खड़ी होकर गुज़रे समय को फिर से जीने की ख्वाहिश करती है — वो अधूरे सपने, वो रिश्ते, वो बचपन की अलमारी, और माँ की बातें… सब कुछ एक बार फिर सहेजने की उम्मीद लिए। यह एक आत्ममंथन है, एक नई शुरुआत की ओर बढ़ने का भावुक आह्वान।”
कभी-कभी जीवन में सबसे बड़ा संघर्ष बाहर की दुनिया से नहीं, बल्कि अपने भीतर के खालीपन से होता है। “पटरी के उस पार” एक ऐसी ही कहानी है, जो एक नवविवाहिता के मन के उस सूनेपन को उजागर करती है, जिसे शब्दों में बयां करना आसान नहीं होता।
राजकीय महाविद्यालय पनारसा में आयोजित 7 दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला का उद्देश्य विद्यार्थियों को सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण के प्रति जागरूक करना है। कार्यक्रम में भारत सहित कई देशों के प्रतिभागी शामिल हो रहे हैं।