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भारतीय शादी में दूल्हा-दुल्हन मोबाइल से रील बनाते हुए, पीछे भावुक परिवार के सदस्य.

स्क्रीन पर मुस्कान, रिश्तों में बढ़ती खामोशी

रील और वायरल होने की दौड़ में क्या रिश्ते कमजोर पड़ रहे हैं? जानिए कैसे सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव शादी, परिवार, दोस्ती और सामाजिक जीवन की भावनाओं को बदल रहा है.

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जो खुद को नहीं जाना, उसने कुछ नहीं जाना!

विद्या का वास्तविक अर्थ केवल तकनीकी ज्ञान या भौतिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं है। यह सबसे पहले स्वयं को जानने, समझने और जीवन के गहरे आध्यात्मिक अर्थ को खोजने की प्रक्रिया है। यदि हम स्वयं को और समस्त प्राणी जगत को एक ईश्वर की रचना मानकर देखें तो जीवन की अधिकांश उलझनें स्वतः समाप्त हो जाती हैं। विद्या वही है जो हमें भीतर से शुद्ध बनाए, आत्मा को जानने का अवसर दे और बाहरी दिखावे के मोह से दूर रखे।

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इंदौर को चटोरों का शहर कह विदा हुए खेमराज मीना

इंदौर रेलवे के पीआरओ खेमराज मीना का अहमदाबाद तबादला हो गया है, जबकि रतलाम से पदोन्नत होकर मुकेश कुमार ने इंदौर में जनसंपर्क की कमान संभाली। विदाई समारोह में मीडिया–प्रशासन के सौहार्दपूर्ण संबंधों पर जोर दिया गया।

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पिंक फ्रॉक

पिंकी की ज़िद नई पिंक फ्रॉक की थी, लेकिन जब उसने अपनी सहेली मुन्नी को फटे-पुराने कपड़ों में देखा तो उसका मन बदल गया। उसने अपनी सुंदर फ्रॉक मुन्नी को दे दी। उस पल उसे समझ आया कि असली खुशी पाने में नहीं, बाँटने में है।

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जब भरोसा टूटे, खुद को संभालना सीखें – एक भावुक हिंदी कहानी

डोर जो बंधी है

रिश्तों की उलझनों और आत्मविश्वास की तलाश के बीच झूलती यह कहानी दो बहनोंकनु और मन्नी—की है, जहाँ एक की कठोर सच्चाई दूसरी के टूटते हौसले को फिर से जोड़ने की कोशिश करती है। क्या मन्नी अपनी खोई हुई पहचान और आत्मविश्वास वापस पा सकेगी?

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बात करते समय मां का चेहरा छूता हुआ छोटा बच्चा

बात करते-करते बच्चा आपका चेहरा क्यों छूने लगता है ?

क्या आपका बच्चा बात करते समय बार-बार आपके गाल, नाक या भौंहों को छूता है? बचपन की यह छोटी-सी आदत प्यार जताने, जिज्ञासा, अपनापन या माता-पिता का ध्यान पाने से जुड़ी हो सकती है। जानिए इस व्यवहार के संभावित कारण और बच्चे को प्यार के साथ व्यक्तिगत सीमाएं सिखाने का सही तरीका।

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दहेज के बोझ से चिंतित बेटी और माता-पिता का भावुक दृश्य

दहेज प्रथा: विवाह संस्कार या सामाजिक व्यापार ?

दहेज प्रथा पर आधारित यह विचारोत्तेजक लेख विवाह जैसे पवित्र संस्कार के बदलते स्वरूप, सामाजिक मानसिकता, आर्थिक दबाव, स्त्रीधन के अधिकार और आधुनिक समाज की वास्तविकताओं पर गंभीर चिंतन प्रस्तुत करता है। यह लेख पाठकों को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है।

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नई शुरुआत

“रात के 1:00 बजे स्टेशन पर बैठे रोहित ने सोचा भी ना था, वो इस तरह आएगी और उसकी ज़िंदगी में सब बदल जाएगा… उस पगली मां की टूटन में रोहित को अपने अपनों की छवि दिखी। और फिर वही स्टेशन, जो आत्महत्या का स्थान बनने वाला था, अब नए सपनों की जन्मभूमि बन गया।”

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सफ़र

ऐ वक्त, ज़रा ठहर जा। मुझे अपने आप से कुछ बातें करनी हैं। यादों की किताब में बिखरे किस्सों को फिर से पढ़ना है। बचपन के उन दिनों को याद करना है जब बेख़ौफ़ होकर खेलते और रातों को आसमान में तारे गिनते थे। सखियों संग बिताए यौवन के मधुर पलों को जीना है, जब बातें करते-करते पहर बीत जाते थे। बाबुल का घर, अम्मा का आंचल और भाई-बहनों का साथ छूटने की कसक अब भी भीतर कहीं घुटती है। सात वचन लेकर शुरू हुए नवजीवन की यादें भी हैं, जो धीरे-धीरे गृहस्थी की उलझनों में बिखर गईं। बच्चों की किलकारियों से गूंजते घर का आनंद था, जिसमें रातें भी उजली लगती थीं। समय कैसे बीत गया, यह समझ ही नहीं आया। अब जीवन की भाग-दौड़ में, शेष बची स्मृतियों के सहारे, सफ़र मानो शून्य की ओर बढ़ता जा रहा है।

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