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डॉ. अनामिका दूबे ‘निधि’ : शब्दों से जीवन संवारने वाली

साहित्य केवल शब्दों का संसार नहीं, बल्कि संवेदनाओं, संघर्षों और समाज को नई दिशा देने का माध्यम है। शिक्षिका, साहित्यकार और राष्ट्रीय साहित्य नवरत्न मंच की संस्थापिका डॉ. अनामिका दूबे ‘निधि’ ने अपनी लेखनी को केवल अभिव्यक्ति का साधन नहीं बनाया, बल्कि इसे नई प्रतिभाओं को पहचान दिलाने और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने का मिशन बनाया है। इस विशेष बातचीत में उन्होंने अपनी साहित्यिक यात्रा, चुनौतियों, पुरस्कारों, डिजिटल युग में साहित्य की बदलती तस्वीर और युवा रचनाकारों के लिए अपने प्रेरक संदेश को बेहद आत्मीयता के साथ साझा किया है।”

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किसको ढोओगे

यह कविता सत्ता के अहंकार, चुनावी राजनीति और सामाजिक विभाजन पर तीखे सवाल खड़े करती है। “किसको ढोओगे” आम जनता की आवाज़ बनकर लोकतंत्र के मूल्यों की याद दिलाती है।

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सूर्यास्त के समय हाथों में हाथ डाले जीवन की राह पर साथ चलते दो साथी।

तुम जो आए…

जीवन की राहें तब आसान और खूबसूरत लगने लगती हैं, जब कोई अपना हर सुख-दुख में हमारे साथ खड़ा होता है। यह भावनात्मक लेख प्रेम, विश्वास, सहयोग और अपनापन जैसे रिश्तों के अनमोल मूल्यों को बेहद सहज शब्दों में प्रस्तुत करता है। सच्चा साथी केवल खुशियों का नहीं, बल्कि कठिन समय का भी हमसफ़र होता है। पढ़िए एक ऐसी प्रेरक रचना, जो रिश्तों की असली ताकत और जीवन में उनके महत्व को दिल से महसूस कराती है।

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मूक प्यार…

मैले कपड़ों में कमल-सी खिलती वह गूंगी-बहरी लड़की हर रोज़ उसे निहारती थी। वह समझ नहीं पाता कि वह उससे क्या चाहती है, जब तक कि एक दिन उसके मांग भरने के इशारे ने मूक प्रेम का गहरा अर्थ खोल नहीं दिया।

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नीले और सुनहरे रंग की पृष्ठभूमि में बारह राशियों के प्रतीकों से बना ज्योतिषीय चक्र, जो 29 जून 2026 के दैनिक राशिफल और भविष्यफल को दर्शा रहा है।

आज का राशिफल 29 जून 2026

29 जून 2026 का दैनिक राशिफल आपके करियर, व्यापार, प्रेम, पारिवारिक जीवन और आर्थिक स्थिति से जुड़े महत्वपूर्ण संकेत लेकर आया है। जानिए मेष से मीन तक सभी राशियों का भविष्यफल, साथ ही अपना शुभ रंग और शुभ अंक।

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…जब कपड़ा लंबा-सिलता था और बचपन भी

आलमारी खोली तो कपड़े बहुत थे, पर एक भी प्रेस किया हुआ नहीं। कपड़ों का ढेर देखते ही बाबूजी याद आ गए जब साल में बस दो बार नए कपड़े सिलते थे। बसंती दा से उधारी में कपड़ा लेना, टेलर की दुकानों के चक्कर, “थोड़ो लंबो-जंबो सिलजो, बच्चा बढ़ रहा है” की आवाज़, और नए कपड़ों के इंतज़ार का उत्साह… आज भले मॉल में पहनकर घर आ जाएं, पर वो इंतज़ार, वो खुशी, अब कहीं नहीं मिलती।

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त्याग, संघर्ष और चिरनिद्रा

पिताजी चौबीसों घंटे की चौकीदारी करते रहे। दिन-रात की दोहरी ड्यूटी, बस कुछ घंटों की अधूरी नींद और एक छोटे से केबिन में सिमटी ज़िंदगी—यही उनका संसार था। मैंने जब जाना कि बाबूजी महीनों तक मुश्किल से दो-तीन घंटे ही सो पाते हैं, तो मेरा दिल काँप उठा। इतना बड़ा त्याग उन्होंने सिर्फ़ इसीलिए किया कि मैं पढ़-लिख सकूँ और परिवार संभल सके। उनके संघर्ष को याद कर आज भी लगता है—किसी इंसान की मजबूती और प्यार का सबसे सच्चा रूप शायद पिता ही होते हैं।

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"दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट पेपर लीक के विरोध में प्रदर्शन, शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े की मांग और सोनम वांगचुक के अनशन का प्रतीकात्मक दृश्य।"

एक इस्तीफ़ा अगर हो भी जाता तो क्या होता

नीट 2026 प्रश्नपत्र लीक, शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े की मांग, सोनम वांगचुक के आमरण अनशन और सरकार के रुख के बहाने यह लेख लोकतंत्र, नैतिक जवाबदेही और जनआन्दोलनों की प्रासंगिकता पर गंभीर प्रश्न उठाता है। क्या जनता की आवाज़ सुनना सरकार की मजबूती का संकेत नहीं हो सकता?

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